नई दिल्ली। हर कोई सेहतमंद रहना चाहता है। खुदा न खास्ता किसी को कोई बीमारी हो जाए तो वो बेहतरीन इलाज चाहता है। संविधान ने राज्य सरकार को जिम्मेदारी दी है कि वो अपने नागरिकों के स्वास्थ्य का ख्याल रखे।
आजादी के 62 साल बाद भी देश का आम नागरिक सस्ते इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। सरकारी अस्पताल के इलाज पर लोगों को भरोसा नहीं है और प्राइवेट अस्पतालों में इलाज उसकी पहुंच से काफी दूर है।
गरीबों के पास महंगे प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने का पैसा नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार ने गरीबों के अच्छे इलाज के लिए राज्य बीमारी सहायता योजना बनाई है, तो इंदौर के सीएचएल अपोलो में गरीब हार्ट पेशेंट्स का इलाज होता है। मगर इस योजना का फायदा ज्यादातर वही उठाते हैं जिनकी ऊपर तक पहुंच होती है।
आम लोगों के स्वास्थ्य और इलाज की बात तो हर बजट में कही जाती है। मगर आम लोगों के स्वास्थ्य को ठीक रखने वाला बजट अपने आप में बीमार साबित होता है। नतीजा इलाज चाहिये तो पैसा लाओ वर्ना मर जाओ।
शहर छोटे हों या बड़े हों इलाज का हाल हर जगह एक जैसा है। सरकारी अस्पतालों में सुविधा नहीं मिलती तो नर्सिंग होम कमर तोड़ देते हैं। जाहिर है सरकार को अपने खजाने से वो इंतजाम करना होगा जो आम लोगों को राहत पहुंचाने वाला हो।
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