भदोही/फिरोजाबाद। सरकारी उदासीनता और मंदी की मार के चलते देश में कई उद्योग सिमटते जा रहे हैं। चाहे वो भदोही का कालीन उद्योग हो या फिर फिरोजाबाद का शीशा उद्योग। ये इलाके कभी देश ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी कला के लिए मशहूर थे लेकिन आज ये गुमनामी के चपेट में है।
दरअसल कालीन नगरी के नाम से मशहूर भदोही में कभी लाखों लोगों का पेट भरने वाला कालीन व्यापार आज आखिरी सांसे गिन रहा है। वहीं सुहाग नगरी कहें या सिटी ऑफ ग्लास के नाम से दुनिय़ा में प्रसिद्ध फिरोजाबाद का भी हाल कुछ इसी तरह का है। चूड़ियां और शीशों से बनी शायद ही कोई ऐसी चीज होगी जो यहां न बनती हो।
लेकिन अपनी चमक से दुनिया को चौंधा देने वाला ये शहर आज अंधेरे की गुमनामी झेलने को मजबूर है। कांच नगरी के कांच उद्योग से जुड़े लोगों के सपने भी कांच की तरह ही चकनाचूर हो रहे हैं। इस खुशहाल शहर को बर्बादी की डगर पर ढकेलने के लिए मजबूर किया है सरकारी की ही नीतियों ने। और रही सही कसर तो मंदी ने पूरी ही कर दी।
कालीन की नगरी भदोही में कभी दिन हो या रात मशीनों की आवाज और कामगारों का हाथ कभी रुकता नहीं था। कालीन की बिक्री काफी ज्यादा थी। जिससे मालिक औऱ कामगार दोनों काफी खुश हुआ करते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों से मालिकों को ऑर्डर मिलना बंद हो गया जिसके चलते कर्मचारियों के हाथों से सुई धागा छूट गया। और वो बेरोजगारों की कतार में खड़े हैं।
ऐसे में सारी उम्मीदें टिकी हैं आने वाले बजट पर। कालीन उद्योग में लगे कारीगरों की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वो बचपन से इस काम को रहे हैं और काम हाथ से निकल जाने के बाद उन्हें कोई दूसरा ऐसा हुनर नहीं आता जिसकी बदौलत वो अपने परिवार का पेट भर सकें। भदोही जनपद में लघु या कुटीर उद्योग एक तरह से समाप्त ही हो चुका है।
एक ज़माने में भदोही की कालीन दुनिया भर में मशहूर था। पूर्वांचल के करीब 25 लाख से ज्यादा लोग इस कारोबार से जुड़े थे।
मालूम हो कि इंदिरा गांधी की सरकार ने भदोही के कालीन व्यापार को काफी बढ़ावा दिया था। अब कांग्रेस की सरकार बनने के बाद यहां के कारोबारी नए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के पिटारे पर टकटकी लगाए देख रहे हैं।
अगर फिरोजाबाद की बात करें तो अपनी चमक से दुनिया को चौंधा देने वाला ये शहर आज अंधेरे की गुमनामी झेलने को मजबूर है। इस खुशहाल शहर को बर्बादी की डगर पर ढकेलने के लिए मजबूर किया है सरकारी नीतियों ने।
दरअसल कई साल पहले तक फिरोजाबाद में कांच का उद्योग कोयले से चलता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस इलाके को ताज ट्रिपेजियम जोन घोषित कर दिया गया। जिसके बाद कांच का सारा कारोबार गैस से होने लगा। जो व्यापारी गैस नहीं ले सके उन्हें अपनी फैक्ट्रीयां बंद करनी पड़ी और यहीं से शुरुआत हो गई कांच उद्योग की बर्बादी की। फिरोजाबाद में इस वक्त कांच उद्योग से जुड़ी 180 यूनिट चल रही हैं। लेकिन सबकी हालत पतली है। और नजरें सरकारी बजट पर है।
शीशा गलाने के लिए 1400 सौ डिग्री से ज्यादा तापमान के आस पास काम करने वाले मजदूरों के पास खुद का इलाज कराने तक के पैसे नहीं बचे हैं। इस खबर पर आप अपनी राय दें।
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