अहमदाबाद। उपेक्षा बुजुर्गों की सबसे बड़ी पीड़ा है। जीवन के आखिरी पड़ाव पर वो परिवार के लिए लगभग महत्वहीन-सा महसूस करते हैं। कई परिवारों में देखने को मिला है कि कि उनकी औलादें उन्हें बोझ समझने लगती हैं। ऐसे बुजुर्गों की आखिरी उम्मीद है सरकार से। वो चाहते हैं कि बजट में ऐसे प्रावधान हों जिससे बुजुर्ग उपेक्षा के शिकार न हों।
ऐसी ही एक बुजुर्ग संयुक्ता पांड्या 81 साल की कहानी है। बीते 12 साल से अहमदाबाद के जीवन संध्या वृद्धाश्रम में दिन काट रही हैं। संयुक्ता का एक बेटा है जो भावनगर में रहता है। वो अपने साथ मां को रखना नहीं चाहता।
संयुक्ता नगर निगम में नौकरी करती थीं 1986 में रिटायर हुईं। तब नगर निगम से पेंशन नहीं मिलती थी। लेकिन एक साल बाद ही पेंशन स्कीम शुरू हुई पर संयुक्ता पेंशन से वंचित रह गईं। आज वो खुद को मजबूर पाती हैं। हालांकि संयुक्ता पांड्या का दुख अब दूर हो सकता है। संयुक्ता जैसे सैकड़ों बुजुर्ग हैं जो कि सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं।
दरअसल गुजरात सरकार ने सीनियर सिटीजंस के लिए एक कानून पारित किया है। इस कानून के तहत बुजुर्ग मां बाप को घर में न रखने वाली संतान को हर महीने 5000 रुपए मुआवजा देना पड़ेगा।
मगर सवाल उन बुजुर्गों का है जिनका कोई नहीं है। ऐसे बुजुर्ग केन्द्र सरकार की ओर देख रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि सरकार बजट में उन्हें अलग से जगह देगी। ताकि ढलती जिन्दगी को सहारा मिल सके।
बुजुर्गों के पास अपने तमाम दर्द हैं। वो दर्द ऐसे हैं जिन्हें कई बार वो चाहकर भी जाहिर नहीं कर पाते। उन्हें हर बार उनके परिवार की जिम्मेदारी मान लिया जाता है। औलादों के रहमों करम पर छोड़ दिया जाता है। लेकिन अब बुजुर्ग अपने लिए सम्मान जनक जगह चाहते हैं। इस खबर पर आप अपनी राय दें।
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