नई दिल्ली। सदियों से ग्रहणों को लेकर इंसान में खौफ रहा है। कभी ग्रहण को महामारियों की वजह माना गया तो कभी भूकंपों की। जब एक ही साल में तीन ग्रहण पड़े तो महाभारत का युद्ध हुआ और विश्वयुद्ध हुए और करोड़ों लोग स्वाहा हो गए। इस साल फिर ग्रहणों की हैट्रिक लगने वाली है इसलिए आशंकाएं भी हैं। दुनियाभर के लोग चिंता में हैं कि क्या ये ग्रहण इस बार भी विनाश लेकर आएंगे? क्या ये दुनिया के अंत की शुरुआत है?
इतिहास गवाह है कि जिस साल सितारों ने अपना रौद्र रूप दिखाया है। जब भी एक के बाद एक तीन ग्रहण पड़े, उस साल जमकर तबाही हुई है। कभी ये सर्वनाश भयानक युद्धों के रूप में सामने आया तो कभी सामूहिक कत्लेआम में और कभी इसने परमाणु बमों का रूप धर लिया। हर बार तबाही का पैमाना इतना बड़ा था कि उसने इतिहास की धारा पलटकर रख दी।
पहला सर्वनाश महाभारत युद्ध के रूप में आया। 3067 ईसा पूर्व इस साल पहली बार तीन ग्रहण पड़े, जिनका रिकॉर्ड मौजूद है। 3031 ईसा पूर्व दूसरी बार सर्वनाश ने झलक दिखाई और द्वारका शहर को समुद्र निगल गया।ये तीन ग्रहणों का कमाल था। वहीं तीसरा मौका 20वीं सदी के पहले और दूसरे विश्वयुद्ध 1910 से 1945 के बीच का था। तब भी तीन ग्रहण पड़े थे।
चौथी बार सर्वनाश परमाणु बम की शक्ल में 1945 में जापान में आया। जब नागासाकी और हिरोशिमा पर अमेरिका ने परमाणु बम गिरा दिए। इस साल भी तीन ग्रहण पड़े थे।
एक बार फिर इस साल फिर जुलाई से अगस्त के बीच तीन ग्रहण पड़ रहे हैं। तो क्या इस बार इतिहास खुद को दोहराएगा। अगर हां, तो हिंदुस्तान और बाकी दुनिया के लिए के इसका क्या मतलब क्या है? क्या ये साल सर्वनाश का साल होगा? फिलहाल दुनियाभर के ज्योतिषी इस सवाल पर सिर जोड़कर सोच रहे हैं
दुनिया के लिए ये एक ऐसा दुर्लभ मौका होगा जब वो एक के बाद एक तीन ग्रहणों की गवाह बनेगी। 7 जुलाई को पहला चंद्रग्रहण, इसके बाद 22 जुलाई को दूसरा सूर्यग्रहण और फिर 6 अगस्त को लगेगा चंद्रग्रहण। लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक कि 2020 तक ऐसे 6 ग्रहण और पड़ेंगे।
3067 ईसा पूर्व में कौरव और पांडवों के बीच ऐसा भयानक युद्ध हुआ कि दुनिया कांप उठी थी। हस्तिनापुर की गद्दी के लिये कौरवों और पांडवों में संघर्ष हुआ। 18 दिन तक दोनों तरफ के योद्धा संघर्ष करते रहे।
14वें दिन यानी 30 अक्टूबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ जयद्रथ वध। कहा जाता है कि जयद्रथ ने शिव के वरदान का दुरुपयोग कर चक्रव्यूह में अर्जुन के बेटे अभिमन्यु का वध कर दिया था। तब अर्जुन ने प्रण लिया कि वो सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध कर देंगे वरना प्राण छोड़ देंगे। मगर जयद्रथ छिप गया। सूर्यास्त करीब था कहते हैं कि कृष्ण ने खगोल वैज्ञानिकों से बात की। पता चला कि अगले दिन शाम को पूर्ण सूर्यग्रहण होने वाला था। इसी के मुताबिक पांडवों ने रणनीति बनाई। सूर्यास्त समझ जयद्रथ बाहर निकला और अर्जुन के बाण ने उसका सिर काट दिया।
बहुत मुमकिन है कि ये खग्रास सूर्यग्रहण रहा हो जिससे जयद्रथ समेत पूरी कौरव सेना कृष्ण की रणनीति के झांसे में आ गई।
तीन ग्रहणों की काली छाया भगवान कृष्ण की नई राजधानी द्वारिका पर भी पड़ी। महाभारत के 36 साल बाद नवंबर 3031 ईसा पूर्व में 20 अक्टूबर को एक चंद्रग्रहण पड़ा। इसके बाद 5 नवंबर को सूर्यग्रहण और 19 नवंबर को चंद्रग्रहण हुए। इसके कुछ समय बाद द्वारिका समुद्र में समा गई।
ज्योतिषी हिंदुस्तान के लिए ग्रहणों की तिकड़ी को खौफनाक बता रहे हैं। उनकी राय में साल की शुरुआत के मुकाबले साल के बीच देश में उथलपुथल बढ़ सकती है। नई सरकार को खराब हालात का सामना करना पड़ सकता है। ग्रहणों का असर जिन राशियों पर पड़ेगा उन्हें खास किस्म के जपदान और सुरक्षा के उपाय अपनाने होंगे।
हिंदुस्तान के लिए ग्रहणों की तिकड़ी की अहमियत इसलिए है क्योंकि इस वक्त भारत अपने पड़ोसी देशों में मची उथलपुथल को महसूस कर रहा है। पहले पाकिस्तान और अफगानिस्तान, फिर श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत सभी जगह राजनीतिक और आर्थिक हालात खराब हुए हैं। ऐसे में एक के बाद एक तीन ग्रहणों के पड़ने से स्थितियां गड़ने का अंदेशा है।
ज्योतिष में कहा जाता है कि ग्रहण के दौरान जल के अंदर छिपे हुए प्रेत जागते हैं और चारों तरफ खामोशी देखकर वे अपना तांडव मचाते हैं। ज्योतिषी कहते हैं कि इस प्रेत को आतंकवाद मानकर देखें तो इसने भारत की जल सीमाओं पर असर डालना शुरू भी कर दिया है। मुंबई में 26 नवंबर को आतंकवादी समुद्री सीमाओं पर अपना तांडव भी दिखा चुके हैं। ऐसे में ये जरूरी है कि समुद्री इलाकों की चौकसी बढ़ाई जाए।
ग्रहों की स्थितियां इस वक्त महाभारत युद्ध के दौरान बनी दशाओं के बारे में बता रही हैं। तब भी भाइयों के बीच युद्ध हुआ था। तो क्या अब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हो सकती है?
ज्योतिषियों की मानें तो ग्रहण इंसान पर अपना गहरा असर डालते हैं। उनका असर इसलिए ज्यादा होता है क्योंकि तब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा किसी खास राशि, ग्रह या नक्षत्र की संवेदनशील जगह से गुजर रहे होते हैं।
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