नई दिल्ली। समलैंगिक समुदाय के लोगों के लगातार दबाव बनाने के बाद पहली बार केंद्र सरकार इस मसले को समलैंगिकों की नजर से देखने को राजी हो गई है। हालांकि अभी तक उसने ये साफ नहीं किया है कि वो इस कानून को हटाएगी या नहीं या फिर वो समलैंगिकता को मान्यता देगी या नहीं लेकिन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली का कहना है कि धारा 377 जिसके तहत समलैंगिक लोगों को अपराधी माना जाता है उसमें बदलाव लाने पर विचार किया जाएगा।
समलैंगिकता को कानूनी दर्जा देने की मांग पर हमेशा सरकार में मतभेद रहे हैं। हालांकि अब स्वास्थ्य, कानून और गृह मंत्रालय कम से कम इस बात पर राज़ी हो गए हैं कि इस कानून में बदलाव की ज़रूरत है। मोइली कहते हैं कि कानून लोगों को सजा देने के लिए नहीं बनाए जाते। इस नजरिए से हम यह कह सकते हैं कि धारा 377 को भी दोबारा देखने की जरूरत है।
स्वास्थ्य मंत्रालय हमेशा से इस बात की वकालत करता रहा है कि समलैंगिकता को कानूनी दर्जा देने से एड्स और यौनजनित बीमारियों को कम किया जा सकेगा। लेकिन गृह और कानून मंत्रालय अब तक धर्म और परंपरा के नाम पर इसका विरोध करते आए हैं। फिलहाल कानून के मुताबिक 1860 में बनी आईपीसी की धारा 377 के अनुसार समलैंगिकता एक अपराध है। दोषी पाए जाने पर दस साल तक की सजा हो सकती है। इस कानून को खत्म करने की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है।
समलैंगिक शादी की कोई कानूनी मान्यता नहीं है। कुछ जानकारों के मुताबिक कानून धार्मिक रीतिरिवाज और वैज्ञानिक तर्क के आधार पर बनाए जाते हैं। समलैंगिकता इन दोनों आधारों पर ही खरी नहीं उतरती। धारा 377 भी भारत में समलैंगिकता पर रोक नहीं लगा सकी है क्योंकि ये दो लोगों की आपसी रज़ामंदी से होता है। कई विकसित देशों में समलैंगिकता को कानूनी दर्जा मिल चुका है और वहां के समाज ने भी इस हकीकत को स्वीकार कर लिया है।
सुबह मीडिया में खबर आई थी कि सरकार धारा 377 को खत्म करने पर विचार कर रही है। इसका असर ये हुआ कि देश के कई महानगरों दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई, कोलकाता में समलैंगिकों ने रविवार को लंबी-चौड़ी रैलियां कीं। नारे लगाए और नाचे गाए। राजधानी दिल्ली में भी रैली में ये आए। लेकिन यहां अभी भी कुछ के चेहरे छुपे ही थे। शायद उन्हें उस दिन का इंतजार है जब इनके सीने पर तलवार की मानिंद तनी हुई धारा 377 सचमुच हटा ली जाएगी।
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