श्रीनगर/नई दिल्ली। क्या दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों के पब्लिक स्कूलों में जिस दर्जे की पढा़ई बच्चों को मयस्सर है, वैसी ही गांव देहात में रहने वालों के लिए सुविधा उपलब्ध है?
शिक्षा भारत के हर नागरिक का मूलभूत अधिकार है। लेकिन गरीबों और गांव देहात में रहने वालों के लिए ये अधिकार , मजाक बनकर रह गया है। वजह है सरकारी स्कूलों की दुर्दशा।
जम्मू-कश्मीर में सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट सर्व शिक्षा अभियान का भी हाल बदहाल है। मिड डे मील योजना भी पूरी तरह से राज्य लागू नहीं हो पाई है। जनता कह रही है शिक्षा के स्तर को उपर उठाने के लिए कुछ तो करो।
पेशे से व्यापारी राजेन्द्र कुमार भी अपने दोनों बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद चिंतित रहते हैं। वो चाहते हैं कि राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में जबरदस्त बदलाव होना चाहिए वरना देश के इन नौनिहालों का भविष्य बर्बाद होना तय है।
उम्मीद इस बार ज्यादा है क्योंकि जम्मू कशमीर में कांग्रेस की गठंबधन सरकार है और केन्द्र में भी। उम्मीद इस बात की भी है कि इस बार जरूर राज्य के लिए शिक्षा का बजट अच्छा हो ताकि स्कूलों की हालत ठीक हो सके और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ बंद हो।
जितने मुंह उतनी बातें, उतनी परेशानियां और उतनी ही उम्मीदें। कहते हैं उम्मीद पर दुनिया कायम है पर जम्मू कश्मीर के इन लोगों की उम्मीद पर इनके बच्चों का भविष्य कायम है। क्या वित्त मंत्री बजट बनाते वक्त देश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था का ख्याल रखेंगे?
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