नई दिल्ली। बाबरी ढांचा मस्जिद था या मंदिर शायद अब ये कभी साबित नहीं हो पाएगा। इस बात के दस्तावेजी सबूत गायब हो चुके हैं। अदालत में 59 साल से ये मुकदमा चल रहा है। अदालत सरकार से ये दस्तावेज मांग रही है। ये दस्तावेज केस के अहम सबूत हैं। 7 सालों तक अदालत को टरकाने के बाद, अब सरकार ने इन दस्तावेजों की गुमशुदगी का ठीकरा एक मर चुके इंसान के सिर फोड़ दिया है।
इस शख्स की एक हादसे में मौत हो चुकी है और ये मौत भी कम रहस्यमय नही है लेकिन अदालती आदेश के बाद भी इस मौत की दोबारा जांच नहीं हो रही। ये कहानी जुड़ी है एक ट्रेन यात्रा से। ट्रेन में दिल्ली जाने के लिए सवार हुए एक सरकारी मुलाजिम से और अचानक उसकी मौत से। कहा जा रहा है कि उस इंसान के पास कई सीक्रेट फाइलें थीं। उस इंसान को अगले ही दिन बाबरी ढांचा ढहाने की वजहों की जांच कर रहे लिब्राहन आयोग के सामने पेश होना था और ये फाइलें देनी थीं।
लेकिन न केवल वो इंसान फाइलें देने से ऐन पहले रहस्यमय तरीके से एक हादसे में मर गया बल्कि उसके पास मौजूद सीक्रेट फाइलें भी गायब हो गईं। इन फाइलों से जुड़ी कहानी दरअसल शुरू होती है 22 दिसंबर 1949 से। बाबरी ढांचे के भीतर रामलला की मूर्तियां मिलने के बाद शुरू हुआ बाबरी विवाद। 29 दिसंबर 1949 को उस पर ताला जड़ दिया गया। 16 जनवरी 1950 को दावेदारी का मुकदमा दायर हुआ। तब से ही अदालत मांग रही है महज सात दस्तावेज।
22 अप्रैल 2002 को सरकार ने कोर्ट में पेश किए दो दस्तावेज और पांच को बताया गया लापता। सात साल तक फिर चली गायब दस्तावेजों की तलाश। अब सरकार ने जो जवाब सौंपा है हाईकोर्ट उससे बेहद खफा है। याचिकाकर्ता के वकील मुश्ताक अहमद सिद्दीकी कहते हैं कि कोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया है कि आप की 23 फाइलें अगर लापता हैं तो आपने क्या कार्रवाई की है दस तारीख को इसका जवाब दें।
चीफ स्टैंडिंग काउंसिल यूपी डी के उपाध्याय कहते हैं कि कोर्ट ने हमसे पांच दस्तावेज मांगे हैं। दो हम दे चुके हैं और 23 फाइलें जो गायब हैं वो सभी इससे जुड़ी नहीं हैं लेकिन हो सकता है कि 23 में ही कोई फाइल ऐसी हो जिसमें ये पांचों दस्तावेज मौजूद रहे हों। इन सीक्रेट फाइलों में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का भेजा टेलीग्राम भी शामिल था। बाबरी ढांचे में मूर्तियां मिलने के बाद उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को ये टेलीग्राम भेजा था।
समझा जा रहा है उस टेलीग्राम में जवाहरलाल नेहरू ने बाबरी ढांचे की हकीकत का खुलासा किया था। तो क्या एक गहरी साजिश रच कर ये फाइलें किसी ने उड़ा लीं और शिकार बना दिया उस सरकारी मुलाजिम को जो ये फाइलें लेकर दिल्ली जा रहा था। जांच अभी जारी है - ये बात दीगर है कि सुभाष साध की ट्रेन से गिरकर हुई रहस्यमय मौत की जांच आज तक पूरी नहीं हुई।
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