गुड़गांव। इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, बेल्जियम सहित दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में बधिरों को गाड़ी चलाने का हक दिया गया है। सवाल ये है कि जब इन देशों के लाइसेंस भारत में मान्यता प्राप्त हैं तो हमारे देश में खुद ये लाइसेंस क्यों नहीं दिया जाता। सीजे अरुण इसी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
अरुण के दोस्त रजत रोज ऑफिस जाने के लिए ऑटो करते हैं। उनके पास अपनी गाड़ी है पर चला नहीं सकते क्योंकि उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सकता। अरुण को ये बात हमेशा परेशान करती है कि रजत ही नहीं देश में 5 करोड़ बधिर हैं और कानून उन्हें ये हक ही नहीं देता कि वो गाड़ी ड्राइव कर सकें।
मोटर यान अधिनियम, 1988 के सब सेक्शन 3 के मुताबिक अगर कोई भी आवेदक किसी भी बीमारी या विकलांगता का शिकार है तो वो गाड़ी चलाते समय लोगों के लिए खतरा साबित हो सकता है और इसलिए उसे ड्राइविंग लाइसेंस नहीं दिया जा सकता। लेकिन अरुण का मानना है कि ड्राइविंग पूरी तरह से दृश्य गतिविधि है। ट्रैफिक पुलिस की वेबसाइट भी कहती है कि ड्राइव करने के लिए बधिरता बंधन नहीं होनी चाहिए।








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