नई दिल्ली। मरीज अस्पताल जाते हैं अपनी जान बचाने के लिए, लेकिन अस्पतालों से इलाज के बदले जानलेवा बीमारी मिल जाए तो मरीज़ कहां जाएं, क्या करें। दिल्ली के कुछ बड़े अस्पतालों में कुछ ऐसा ही हो रहा है। दिल्ली में एक शख्स पिछले नौ महीने से सिर्फ ये जानने के लिए संघर्ष कर रहा है कि उसके बच्चे को HIV जैसी लाइलाज बीमारी देने वाले आखिर कौन हैं।
उस शख्स के मुताबिक 3 साल पहले उसके बेटे दीपक को सांस लेने में दिक्कत हुई। वो उसे फ़ौरन दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले गया, जहां दो महीने के इलाज के बाद उसे बताया गया कि उसे फेफड़ों का कैंसर है। 8 महीने तक बच्चा अस्पताल में भर्ती रहा। इलाज के दौरान कई बार उसे खून चढ़ाया गया। दो साल इलाज चलने के बावजूद दीपक की तबीयत में सुधार नहीं आया उल्टे धीरे-धीरे उसका वजन कम होने लगा।
बच्चे की हालत देखते हुए डॉक्टरों ने एड्स और हेपेटाइटिस-बी और सी की जांच करवाई। जांच के नतीजे में पाया गया कि बच्चा HIV पॉजीटिव है। उस शख्स ने तुरंत अपना और अपनी पत्नी का टेस्ट करवाया जिसमें दोनों को नेगेटिव पाया गया। साफ है कि बच्चे को ये बीमारी संक्रमित खून या सिरिंज के जरिए ही लगी है।
बीमारी के 3 साल के दौरान जीटीबी के अलावा किसी दूसरे अस्पताल में इलाज नहीं हुआ। कहीं कोई इंजेक्शन तक नहीं लगा। जाहिर है संक्रमण का इकलौता जरिया था वो खून जो इलाज के दौरान जीटीबी में उसे चढ़ाया गया।
इस शख्स ने जानलेवा लापरवाही के बारे में अस्पताल प्रशासन से ये जानना चाहा कि उनके बेटे को जो खून चढ़ाया गया क्या वो सुरक्षित था? इस बारे में उसे कोई जवाब नहीं मिला। आखिरकार उसने राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग में गुहार लगाई।
मानवाधिकार आयोग ने स्वास्थ्य सचिव को दो हफ्ते के अंदर इस मामले की जांच के आदेश दिए। इस बीच अपने बेटे की बिगड़ती तबीयत को देखते हुए उसने दिल्ली के एक दूसरे सरकारी अस्पताल में उसका HIV टेस्ट कराने का फैसला किया। लेकिन जीबी पंत अस्पताल की रिपोर्ट देख उस पिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। जी बी पंत अस्पताल ने दीपक को HIV नेगेटिव बताया। इसके बाद दीपक का टेस्ट रोहिणी के बीआर अम्बेडकर अस्पताल में कराया गया। वहां भी वो HIV नेगेटिव पाया गया।
सवाल ये है कि एक ही शख्स के HIV टेस्ट को लेकर दिल्ली के तीन बड़े अस्पताल अलग-अलग रिपोर्ट कैसे दे सकते हैं। बच्चे के माता-पिता से लिखित में ये आश्वासन ले लिया जाता है कि खून चढ़ाए जाने के दौरान अगर बच्चे को HIV या हेपेटाइटिस संक्रमण हो जाता है तो इसका जिम्मेदार अस्पताल नहीं होगा। सवाल ये है कि क्या कोई भी अस्पताल अपनी इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकता है?








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