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बीजिंग में एक नए भारत की दस्तक!

  • अभिषेक दूबे
  • अभिषेक दूबे, आईबीएन-7
Posted on Aug 20, 2008 at 09:36pm IST | Updated Aug 21, 2008 at 10:09am IST

108 साल तक तरसे थे हम...ओलंपिक आता और चला जाता और हमारी उम्मीदें बनतीं और टूट जातीं। हर बार हम एक ही रोना रोते, काश हमें एक गोल्ड मिला होता, काश पोडियम पर सबसे ऊपर हमारा तिरंगा होता, क्या हम सवा सौ करोड़ लोगों में से एक ऐसा नहीं जो हमें ओलंपिक में अकेले एक सोना दिला सके।

बचपना बीता, जवान हो गया, पढ़ाई छोड़ी पत्रकार बन गया, लेकिन ये वो सवाल था जो बार-बार दिल को कचोटता था...जब भी ये सवाल पूछता बुजुर्गों से एक ही जवाब मिलता, जानते हो मिल्खा सिंह ओलंपिक में पदक पाते-पाते रह गए थे, तुम्हें पता है पीटी उषा मंजिल के करीब पहुंचते दूर रह गई थी। जब बुजुर्गों से ये तर्क सुनता तब लगता कि कार्ल लुइस महामानव है और सर्गेई बुबका एक रोबोट का नाम है। ऐसा नहीं था कि हमें गोल्ड नहीं मिला था। हॉकी में हमने आठ ओलंपिक गोल्ड जीते, लेकिन ये गोल्ड टीम इवेंट में मिले।

ऐसा भी नहीं था कि ओलंपिक में अबतक हमें कोई दूसरा मेडल नहीं मिला। जाधव ने कुश्ती में, लिएंडर पेस ने टेनिस में तो राठोर ने शूटिंग में मेडल दिलाए, लेकिन इन मेडलों के पीछे इत्तेफाक अधिक और भरोसा कम था।

खेल सिर्फ खेल नहीं, एक जंग है, मैदान ए जंग...जब राष्ट्र की सीमाएं शांत हो, सैनिक बेरक में हों और सैन्य प्रयोग प्रयोगशाला तक सीमित हो तभी खेल ही वो चीज है जो माध्यम बन राष्ट्र को अपनी ताकत का एहसास कराता है।

दरअसल अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध के दौरान सरगेई बुबका सिर्फ सिर्फ छलांग नहीं लगाते, बल्कि हर छलांग के साथ अमेरिका और सहयोगी देशों को रूस की ताकत का एहसास दिलाते थे। ओलगा कोर्बर्ट के बाद अगर कोई एथलीट जिमनास्टिक को घर-घर ले गईं तो वो रोमानिया कि नाडिया थीं। रोमानिया के इस एथलीट की मां गर्भावस्था में एक रूसी फिल्म देख रहीं थी, जिसमें अभिनेत्री का नाम नाडिया था। मां, इतना प्रभावित हुई कि बेटी का नाम नाडिया रख दिया। वही नाडिया जो शीतयुद्ध के दौरान ईस्टर्न ब्लॉक की पहचान बनीं, अपने हुनर से पश्चिमी देशों को ललकारा और ललचाया।

हर बार की तरह, इस बार भी ओलंपिक आया। खेल को जबसे मैंने बारीकी से समझने की कोशिश की है एक पैटर्न देखा है। पहले रूस के वर्चस्व को देखा , फिर अमेरिका का बोलबाला और अब चीन की बारी है।

दरअसल जब-जब इन देशों को आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक तौर पर आगे बढते देखा, ये देश ओलंपिंक मूवमेंट में भी आगे गए। हम भारत में आईटी क्रांति की बात करते हैं...हम भारत में आर्थिक क्रांति की बात करते हैं...हम भारत में मिडिल क्लास के उदय की बात करते हैं...हम भारतीय कंपनियों द्वारा दुनिया की नामीगरामी कंपनियों को खरीदे जाने की बात करते हैं...लाख टके का सवाल ये है कि अगर भारत एक ताकत की तरह आगे बढ़ रहा है तो क्या इसका असर खेल के मैदान पर दिख रहा है?

क्या भारत कभी खेल में महाशक्ति बन सकता है? अगर 150 करोड़ लोगों का देश चीन ऐसा कर सकता है तो फिर 125 करोड़ का देश भारत क्यों नहीं? इन्हीं सवालों के बीच हमारा दल जब बीजींग गया, तो लगा कि हम सिर्फ खानापूर्ति के लिए जा रहे हैं। लगा कि हमारे एथलीट इसलिए जा रहे हैं क्योंकि ओलंपिक में हर देश अपना दल भेजता है। ये सोच तभी और पुख्ता हो गई था जब आठ बार ओलंपिक चैंपियन हॉकी की टीम ओलंपिक से बाहर हो गई।

एतिहासिक लम्हे कई बार झन्नाटेदार तरीके से तो कई बार बिना आहट दिए आए। बीजिंग ओलंपिक में भारत के लिए ये पल बिना दस्तक के आया। कामयाबी के अलग-अलग मायने होते हैं, चंडीगढ़ के पास जीरकपुर में एक करोड़पति के फार्म हाउस से एक सोना निकला तो नजफगढ़ के देसी अखाड़े से एक कांसा। जीरकपुर और नजफगढ़ के बीच एक जगह है भिवानी।

हरियाणा के तीन लालों में एक बंसीलाल का शहर भिवानी...यहां से एक नहीं, तीन जवानों पर दांव लगा था। बीबीसी, जी हां, भिवानी बॉक्सिंग सेंटर रातोंरात पूरे देश का केंद्र बिंदु बन गया था। सवाल ये था कि अखिल, जितेंदर और विजेंदर में से कौन बीबीसी का नाम रौशन करेगा। अखिल वर्ल्ड चैंपियन को हराने के बाद अगला दौर हार गए और जितेंदर के अभियान ने भी दम तोड़ दिया।

बारी विजेंदर की थी...8 मिनट तक विजेंदर बॉक्सिंग रिंग में थे और 125 करोड़ लोगों की सांसे थमी थी। क्रिकेट का दीवाना देश टीवी और रेडियो से चिपक कर बैठा था...

भिवानी का आलम तो कुछ अलग ही था। जैसे बीजिंग में सिर्फ विजेंदर नहीं, पूरा भिवानी लड़ रहा था। लोगों पूजा पाठ कर रहे थे, व्रत रख रहे थे और भगवान से मन्नतें मांग रहे थे..क्या बुजुर्ग क्या जवान, क्या सैनिक क्या छात्र हर कोई यही दुआ कर रहा था, विजेंदर हमें एक मेडल चाहिए।

घड़ी में जैसे ही 6 बजकर 38 मिनट हुआ, पूरा देश जश्न में डूब गया। स्कोरलाइन जैसे ही 9-4 हुआ, पूरा देश मदमस्त हो गया। दरअसल ये मेडल सिर्फ विजेंदर का नहीं 125 करोड़ भारतीयों का था। अभिनव बिंद्रा के गोल्ड से अधिक महंगा है सुशील का कांस्य और विजेंदर का मेडल।

टैलेंट कच्चे-पक्के मकान से, छोटी-छोटी गलियों से और टूटी सडकों से गुजरकर आता है। यहां लोग अभिनव की तरह करोड़ों खर्च कर शूटिंग तो नहीं कर सकते, लेकिन विजेंदर की तरह बॉक्सिंग और सुशील की तरह कुश्ती करने का सपना जरूर देख सकते हैं।

खत्म हुआ 108 साल का इंतंजार, जिस चीज के लिए हम 108 साल तरसे थे वो आठ मिनटों में पूरा हो गया। ये भारत के आत्मविश्वास की कहानी है, विकास की कहानी है और नए भरोसे की कहानी है।

एक विजेंदर से सौ विजेंदर बनेंगे, एक सुशील हजार सुशील को जन्म देगा और एक अखिल से सैंकड़ो अखिल निकलेंगे। इस बीच मुट्ठी भर अभिनव भी हमारा सीना चौड़ा कराते रहेंगे। अब हम फिर से तरस रहे हैं, एक गोल्ड मेडल के लिए नहीं बल्कि ओलंपिक में चीन और अमेरिका जैसे देशों को पीछे छोड़ नम्बर वन बनने के लिए...खेल की दुनिया में महाशक्ति बनने के लिए...


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