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'बच्चे मासूम होते हैं उनसे बचपन मत छीनो’

Posted on Nov 18, 2009 at 02:41pm IST | Updated Nov 18, 2009 at 03:16pm IST

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मेरठ। सिटीज़न जर्नलिस्ट में इस बार कुछ ख़ास है। ऐसे बच्चों की कहानी जिनकी हिम्मत और कोशिशों ने बदलाव की एक नई कहानी लिखी है। क्रिकेट और फुटबॉल हम सबके मनपसंद खेल हैं। शायद ही कोई बच्चा हो जो बचपन में गेंद से न खेला हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि खेलने का ये सामान किस तरह हमसे हमारा बचपन छीन रहा है।

दरअसल मेरठ के लगभग हर घर में फुटबॉल सिलने और खेल का सामान बनाने का काम होता है। ज्यादातर घरों में ये काम बच्चे ही करते हैं। दिनभर सिलाई का काम होने से बच्चे को स्कूल जाने का समय नहीं मिलता। उन बच्चों में से एक रज़िया सुल्तान भी है। जो अपने घर में फुटबॉल सिलने का काम करती थी।

एक दिन रजिया के घर कुछ लोग आए और कहा कि तुम पढ़ाई छोड़ कर जो काम कर रही हो, इससे तुम अपना भविष्य बर्बाद कर रही हो। उसके बाद रजिया से फैसला किया कि वो खुद भी पढ़ेगीं और दूसरे बच्चों को भी पढ़ाएंगी। और इस काम की शुरुआत उसने एक बाल पंचायत बना कर की। बाल पंचायत का काम था बच्चों को और उनके मां-बाप को समझा कर स्कूल भेजने और पढ़ने के लिए तैयार करना। बच्चे सुबह स्कूल जाने लगे और बचे हुए वक्त में काम भी करते थे।

यही नहीं, जिस स्कूल में रजिया पढ़ती थी उसका भी बुरा हाल था। स्कूलों में क्लासरूम नहीं थे। मिड डे मील में जो खाना दिया जाता था वो खाने लायक नहीं था। रजिया ने इसके खिलाफ कदम उठाने का फैसला किया। इसकी शिकायत बच्चों ने स्कूल के शिक्षकों और गांव के प्रधान से की। इस जागरुकता को लेकर ज्यादातर लोग खुश नहीं थे। लेकिन फिर भी वो डटी रही।




आखिरकर, रजिया की कोशिश रंग लाई। आज कई स्कूलों की हालत काफी बेहतर है।


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