चंदौली। सड़कों पर अपनी जिंदगी गुज़ारने वाले मासूमों के लिए कुछ करने की इच्छा तो बहुत से लोगों में होगी लोकिन शायद ही कोई ऐसा हो जो अपनी जिंदगी ही इन बच्चों के नाम कर दे। सिटीज़न जर्नलिस्ट राजीव श्रीवास्तव की मुहिम कुछ ऐसी ही है।
हर सुबह जब कुछ बच्चे, कंधों पर स्कूल का बैग लटकाए, हाथ में टिफिन उठाए स्कूल जाने के लिए निकलते हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे बड़ा सा झोला लिए निकल पड़ते हैं रोजी रोटी की तलाश में। पेट भरने के लिए वो कूढ़े के ढेर में ढूंढते हैं अपने लिए खाना। ये बच्चे स्कूल नहीं जा सकते क्योंकिं इन्हें अपना और अपने परिवार का पेट भरना है और इसी जद्दोजहद में बीत जाता है इनका बचपन।
चंदौली के मुगलसराय इलाके के रहने वाले राजीव श्रीवास्तव ने बताया कि जब वो स्कूल में थे तो अपने आस-पास कूड़ा बीनते बच्चों पर हमेशा उनकी नजर ठहर जाती थी। उनके बारे में सोचकर उन्हें दुख होता था कि ये बच्चे कितनी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उन्होंने ठाना कि इन बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए एक कोशिश करूंगा।
1988 में इंटर की पढ़ाई के दौरान राजीव ने स्टेशन पर कूड़ा बीनने वाले बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। स्टेशन पर जाकर इन बच्चों को पढ़ाना राजीव के घर वालों को अच्छा नहीं लगता था। लेकिन वह नहीं माने और कुछ महीनों बाद उन्हें घर से निकाल दिया गया। घर से निकाले जाने के बाद भी राजीव ने अपनी और उन गरीब बच्चों की पढ़ाई जारी रखी।
1992 में राजीव मुगल सराय से वाराणसी आ गए और यहां शास्त्री पार्क में गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 1996 में राजीव को नेहरू फैलोशिप मिली जिसमें उन्हें साढ़े 4 हजार रुपये महीना मिलने लगा। उन्होंने एक कमरा किराए पर लिया और बच्चों को पढ़ाने लगे।
2007 में राजीव को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में बतौर लेक्चरर नौकरी मिल गई और बच्चों के भविष्य को संवारना अब उनकी जिंदगी का मकसद बन गया। पढ़ाने के अलावा मैंने बच्चों को स्कूल की वर्दी, कॉपी, किताबें और एक समय का खाना देना शुरू कर दिया। जो पढ़ने में तेज हैं और आगे पढ़ना चाहते हैं राजीव उनकी औपचारिक शिक्षा के इंतजाम की कोशिश भी करते हैं।
ये हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है कि 5 साल 10 साल कि उम्र के बच्चे मेहनत मजदूरी करके पूरे परिवार का पेट पालते हैं लेकिन अपने हक और खुद पर हो रही ज्यादतियों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाते। इन गरीब- मेहनतकश बच्चों की आवाज सुनी जाए इसलिए राजीव ने बच्चों की अपनी एक संसद बनाने के बारे में सोचा।
बच्चों ने जल्द ही एकजुट होकर काम शुरू कर दिया और एक ऐसी बाल संसद बनाई जहां बच्चे ही सांसद हैं और बच्चे ही स्पीकर। पूरे शहर के बच्चे वोट देकर इस संसद के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। संसद का काम है बच्चों की जरूरतों और उनके मुद्दों को सुलझाना।
5 से 13 साल की उम्र के इन बच्चों ने अब एक अखबार निकालना भी शुरू किया है। बच्चे ही इसके रिपोर्टर हैं और बच्चे ही संपादक। गली मोहल्लों में जाकर ये बच्चे ऐसी खबरें इकट्ठी करते हैं जिनका ताल्लुक बच्चों से हो।
आम बच्चों की तरह ये बच्चे भी बहुत कुछ कर सकते हैं, बहुत कुछ करना चाहते हैं। जरूरत है इनकी इस चाहत को पहचानने व उसे जिंदा रखने की। राजीव कहते हैं कि अगर हम और आप भी अपने आस पास रहने वाले ऐसे बच्चों के बारे में सोचें। अगर एक बच्चे की जिंदगी भी संवारते हैं तो देश का कोई बच्चा दर-दर भटकने को मजबूर नहीं होगा।
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