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यहां की लड़कियां पहले मां बनती हैं फिर होती है शादी

Posted on Dec 13, 2009 at 06:40pm IST | Updated Dec 13, 2009 at 07:41pm IST

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कोलकाता। प्रकृति की गोद में बसे टोटो जनजाति के लोग अपने को बचाने में लगे हैं। टोटो का अस्तित्व खतरे में हैं। इस जनजाति ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए बड़े सख्त नियम बनाए हैं। ताकि उनके लोग भटक न सके और एक-दूसरे से बंधे रहे। यहां की अधिकतर लड़कियों की शादी मां बनने के बाद होती है। ये दुनिया की सबसे छोटी जनजाति है। टोटो जनजाति की तादाद महज 13सौ बची है। इनकी परंपरा, रहन-सहन, बोल-चाल, रस्मो-रिवाज में बिल्कुल अलग है। 1901 में टोटो समुदाय के लोगों को संख्या 172 थी। जो अब 2009 में पहुंची है किसी तरह 1300 तक।

टोटो जनजाति की लड़कियां पहले मां बनती हैं और बाद में होती है शादी। इसका भी तरीका बिल्कुल अलग है। टोटो समुदाय के लड़के को जो लड़की पसंद आती है। वो उसे रात के अंधेरे में लेकर भाग जाता है। फिर उसे अपने घर में रखता है। दोनों साथ-साथ रहते हैं और इस दौरान जब लड़की मां बन जाती है। तब जाकर करीब सालभर बाद दोनों की शादी होती है। परंपरा के हिसाब से यहां के लड़के अपने मामा की बेटी को लेकर भागते हैं और उन्हीं से शादी करते हैं।

अपने अस्तित्व को बचाने के लिए इस जनजाति के लोगों ने ऐसी परंपरा की नींव डाली। जिससे ये जनजाति बची रहे। शादी का नियम बेहद सख्त है और इसे तोड़ने वालों को शादी में ज्यादा खर्च और पूजा-पाठ करना पड़ता है। वहीं अगर कोई लड़की मां नहीं बन पाती है और लड़के-लड़की इस संबंध से छुटकारा चाहते हैं तो इसके लिए भी कायदा है। ऐसे युगल को इस संबंध से तभी मुक्त मिलती है जब वो सूअर की बलि दे दे। लेकिन अपने बनाए रस्मो-रिवाज ने भी इनके लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। इस समुदाय पर थैलिसीमिया मौत बनकर मंडराने लगा है।




पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले का इलाका है टोडोपाड़ा। बिल्कुल भारत-भूटान बॉर्डर पर। गिनती के टोटो जनजाति के लोगों से ही ये इलाका गुलजार है। प्रकृति ने इन्हें अपना गुजर बसर करने को बहुत कुछ दिया है। महिलाएं खेतों में मेहनत-मजदूरी करती हैं। अन्न उपजाती हैं। जंगल की लकड़ियां खाना बनाने के काम आता है। कुछ महिलाएं पत्थर तोड़कर परिवार चलाती हैं। यहां भारत से ज्यादा भूटान के नोट चलते हैं।

टोडोपाड़ा से भूटान की दूरी है महज 3 से 4 किलोमीटर। भूटान के शहर-बाजार यहां से ज्यादा करीब हैं। भारत के बड़े शहर टोडोपाड़ा से कम से कम 30 किलोमीटर की दूरी पर हैं। चूंकि रोजगार के लिए टोडो जनजाति के लोग भूटान पर निर्भर हैं। इसलिए वहां से मेहनताना भी भूटानी न्यूट्रम ही मिलता है।

गौरतलब है कि 109 साल में भारत की तस्वीर बदल गई। करोड़ों की आबादी वाला भारत 1 अरब के आंकड़े को पार कर गया। लेकिन नहीं बदला तो टोटो की किस्मत। अपनी जनसंख्या बढ़ाने के लिए टोटो जनजाति के लोगों ने कड़े कायदे-कानून तो बना दिए। लेकिन इससे अब हालात बदलने की जगह बिगड़ने के अंदेशे बढ़ गए हैं। असल में इनकी खुशियों में थैलिसीमिया नाम की खतरनाक बीमारी का दीमक लग गया है। और ज्यादा डराने वाली बात ये है कि इन्हें इस बीमारी के बारे में कुछ पता नहीं है। इसका खुलासा कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र कैंसर रिसर्च सेंटर ने किया है। सेंटर ने टोटो जनजाति के लोगों के खून के नमूने लिए। इन नमूनों का जब नतीजा आया तो जानकारों के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। जांच में पता चला कि टोटो जनजाति के 56 फीसदी लोग थैलीसीमिया के शिकार हैं।

थैलीसीमिया खून से संबंधित बीमारी है। ये बीमारी मां-बाप से बच्चों को भी होने की आशंका रहती है। यानी ये आनुवांशिक बीमारी है। इस बीमारी के बारे में जानकारी नहीं होने से टोटो जनजाति के लोगों की औसत उम्र 35 से 45 साल तक सिमट गई है। चूंकि इस जनजाति के लोगों ने अपनों में ही शादी के रिवाज बनाए हैं। इसलिए इस बीमारी का खतरा और बढ़ जाता है। टोटो की तादाद तेजी से नहीं बढ़ने की एक वजह थैलीसीमिया भी हो सकती है। जानकारों का कहना है कि अगर इन्हें जागरुक नहीं किया गया तो इनके अस्तित्व पर खतरा यूं ही मंडराता रहेगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए टोटो समुदाय को शादी-ब्याह के मामले में हिदायत दी जा रही है।

टोटो जनजाति को बचाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। चंद लोग अपने-अपने स्तर पर टोटो को बचाने की मुहिम में जुटे हैं। इस जनजाति को बचाने के लिए इनकी परंपराओं और रीति-रिवाजों को भी बदलना पड़ेगा। और इसके लिए सबसे जरूरी है जागरुकता। जागरुकता के लिए सरकार की तरफ से होने वाली कोशिशें नाकाफी हैं। अगर रवैया इतना ही लचर रहा तो धरती से एक जनजाति सदा-सदा के लिए खत्म हो सकता है।


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