पटना। क्या आपने सुना है किसी को 16 साल से सैलेरी नहीं मिली हो? सरकारी नौकरी होते हुए भी दाने-दाने को मोहताज हो? अगर नहीं तो मिलिए बिहार में 21 निगम के 12 हजार से ज्यादा कर्मचारियों से।
पटना में रहने वाले सत्य नारायण महतो की दोनों किडनी फैल हो चुकी हैं। न घर में पैसा है और न ही छटांक भर खाने को अनाज। इनको इस हाल में पहुंचाने वाला कोई और नहीं बल्कि खुद बिहार सरकार है। सत्यनारायण बिहार राज्य औषधि एवं रसायन विकास निगम पटना में नौकरी करते थे लेकिन अचानक 1993 में बिहार सरकार ने तनख्वाह देना बंद कर दिया। लाख कोशिशों के बाद आज तक उन्हें एक फूटी कौड़ी तक नहीं मिली।
बिहार राज्य वस्त्र निगम में नौकरी करने वाले अमरेंद्र का भी यही हाल है। हालत इतनी खराब है कि इनके बेटा-बेटी को इनके भाई पाल रहे हैं। पैसे के अभाव में अमरेंद्र की आंखों की रोशनी जा चुकी है। एक वक्त खा लेते हैं तो दूसरे वक्त की चिंता सताने लगती है।
सत्यनारायण और अमरेंद्र की तरह बिहार के हजारों लोग एक-एक रोटी के लिए तरस रहे हैं। कुछ पैसों की उम्मीद में सचिवालय के चक्कर काट रहे हैं तो कुछ पैसे मिलने के इंतजार में दुनिया छोड़ कर चले गए। अगर सरकार का यही रवैया रहा तो न जाने कितने लोग भूख और इलाज के अभाव में बेमौत मारे जाएंगे। लगभग तीन हजार ऐसे लोग भी हैं जो पैसों की बाट देखते-देखते दुनिया से भी जा चुके हैं।
पटना के आर ब्लॉक चौराहे पर 21 निगमों के कर्मचारी 19 अगस्त 2009 से आंदोलन कर रहे हैं। मौजूदा नीतीश सरकार ने सत्ता में आने से पहले इनके वोटों की खातिर उनकी बकाया सैलेरी दिलवाने का वायदा किया था लेकिन नेताओं का वो वायदा ही क्या, जो पूरा हो जाए। बिहार के उप मुख्यमंत्री की गद्दी मिलने से पहले सुशील कुमार मोदी इन कर्मचारियों को हक दिलाने की लड़ाई का नेतृत्व करते थे लेकिन सत्ता का सुख मिलते ही वो भी इनको भूल गए।
2002 में कैंसर की बीमारी से जूझ रहे अपने पिता का इलाज करवाने के लिए चंदन भट्टाचार्य ने अपने पिता की बकाया सैलेरी की मांग की। जब किसी ने उसकी फरियाद नहीं सुनी तो उसने पटना हाईकोर्ट के पास खुदकुशी कर ली। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की बकाया सैलेरी देने का आदेश दिया। कुछ लोगों को राहत के नाम पर पैसे भी मिले लेकिन वक्त गुजरने के बाद सरकार फिर खामोश हो गई।
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