नई दिल्ली। महंगाई को लेकर सरकार कुछ एक्शन में दिख रही है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद मुख्यमंत्रियों की साथ बैठक भी हो गई है। लेकिन आरटीआई से मिली जानकारी से खुलासा हुआ है कि पीएमओ महंगाई को लेकर काफी देर से जागा है।
खाने-पीने की चीजों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद पीएमओ ने ना तो राज्य सरकारों को और ना ही अपने मंत्रालयों को कोई निर्देश जारी किए। सारा कुछ शरद पवार के भरोसे छोड़ दिया गया।
खाने-पीने के सामान के दाम आसमान छूते रहे। आम लोगों की जेबें हल्की होती रहीं। जब हालात खुद से नहीं संभले तो राज्य सरकारों को विलेन बताया जाने लगा। लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि इस पर काबू पाने के लिए पीएमओ ने खुद कोई पहल की ही नहीं।
सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय से साफ तौर पर बताया है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए PMO ने राज्य सरकारों को अब तक कोई निर्देश जारी नहीं किए।
हो सकता है कि इसके पीछे ये दलील दी जाए कि राज्य सरकारें पीएमओ के सीधे नियंत्रण में नहीं आतीं। लेकिन चौंकाने वाली बात तो ये है कि PMO ने अपने मंत्रालयों को भी इसके लिए कोई दिशानिर्देश जारी करना जरूरी नहीं समझा।
PMO ने अपने जवाब में कहा है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए कंज्यूमर अफेयर्स मिनिस्ट्री और फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन डिपार्टमेंट जरूरी कदम उठाता है।
जबकि सच्चाई ये है कि दाल और चीनी इम्पोर्ट बढ़ाने का मामला हो या फिर चावल एक्सपोर्ट कम करने का फैसला हो वित्त, वाणिज्य और कृषि मंत्रालय कई बार आमने सामने नजर आए। बैठकों का लंबा सिलसिला चला। लेकिन PMO चुप्पी साधे रहा।
केंद्र से मिलने वाले अनाज लेने में कोताही और जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई जगजाहिर हो गई फिर भी पीएमओ ने राज्यों के साथ तालमेल के लिए कोई पहल क्यों नहीं की? जानकारों की मानें तो अगर पीएमओ ने शुरू में गंभीरता दिखाई होती तो शायद हालात इतने नाजुक नहीं होते।








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