आगरा। कहा जाता है कि वीरान है वो दिल जिसमें मुमताज नहीं। जी हां, शाहजहां से मुहब्बत में मुमताज ने वो मुकाम हासिल कर लिया कि मुहब्बत का कोई फसाना उसका नाम लिए बिना पूरा नहीं होता।
उस बादशाह के बारे में क्या कहें, जिसे अपनी सल्तनत के लिए कम, दुनिया को मुहब्बत की शानदार निशानी देने के लिए ज्यादा याद किया जाता है।
मुमताज़ महल यानी अर्जुमंद बानो बेगम अप्रैल 1593 में आगरा में पैदा हुईं। उनके पिता अब्दुल हसन आसफ खान, नूरजहां के भाई थे। नूरजहां यानी जहांगीर की बेहद ताकतवर बेगम।
कहा जाता है कि पहली बार अर्जुमंद को शहजादे खुर्रम ने नौरोज के मौके पर देखा और अपना दिल दे बैठे।
वक्त आया और सन 1612 में एक दिन अर्जुमंद बानो का निकाह खुर्रम से हो गया। तब वो 19 साल की थीं। अर्जुमंद को शाहजहां ने मुमताज महल का नाम दिया।
मुमताज शाहजहां की तीसरी बीवी जरूर थीं, पर वो उनका पहला प्यार थीं। इसलिए जल्द ही वो उनकी पसंदीदा पत्नी बन गईं।
शाहजहां को मुमताज से एक पल की दूरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी। मुमताज भी हमेशा साथ रहना चाहती थीं। वो दरबारी मसलों में भी शाहजहां को मशविरा देती थीं। बादशाह को मुमताज पर इतना यकीन था कि उसने उन्हें शाही मुहर भी दे रखी थी।
मुमताज इस बीच बादशाह की 13 औलादों की मां बनीं जिनमें से 7 की कम उम्र में ही मौत हो गई। बादशाह जब सैनिक अभियानों पर जाता था, तो मुमताज उनके साथ हुआ करती थीं।
ऐसा ही एक अभियान था बुरहानपुर का। तब वो बादशाह के 14वें बच्चे की मां बनने वाली थीं। 17 जून 1631 को उन्होंने चौदहवीं संतान गौहारा बेगम को जन्म दिया और इसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई।
कहा जाता है कि मरने से कुछ वक्त पहले मुमताज ने शाहजहां से वादा लिया कि वो उनकी याद में ऐसी इमारत खड़ी करें जो पूरी दुनिया में सबसे बेहतर हो। दुनिया जानती है कि शाहजहां ने अपना वादा पूरा किया।
मुमताज और शाहजहां की बेपनाह मोहब्बत की निशानी ताज प्यार करने वालों के लिए किसी इबादतगाह से कम नहीं।
वक्त के थपेड़े इस शाहकार को हिला न सके। हर दौर के आशिकों की एक ही ख्वाहिश होती है कि वो एक बार ताज के सामने अपनी मुहब्बत का इजहार करें, कभी न बिछड़ने की कसम खाएं।
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