नई दिल्ली। तसलीमा नसरीन के कथित लेख पर कर्नाटक में मचे बवाल के बाद बुर्का, हिजाब और पर्देदारी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इसमे कोई दो राय नहीं कि बुर्का आम मुसलमान औरत की पहचान बन गया है। इस बहाने इस्लाम में औरतों के दोयम दर्जे की बात भी उठती है। सवाल ये है कि इस्लाम में बुर्का सचमुच अनिवार्य है, या फिर इसे जानबूझ कर औरत पर लादा जा रहा है।
दरअसल ये भी एक नजरिया है। इस नजरिए में सच की झलक है। अगर ये सच है तो क्या यही बात बुर्के और हिजाब पर नहीं लागू होती। लेकिन एक अखबार में बुर्के के बारे छपा एक लेख दंगों की वजह बन जाता है। कर्नाटक के हासन और शिमोगा ने इसकी तपिश झेली है। आखिर बुर्के के पीछे का नजरिया क्या है। ये नजरिया क्या औरत की आजादी में बाधा नहीं है। लेकिन सच्चा इस्लाम तो औरत की आजादी का हामी है।
कुछ लोगों की नजर में बुर्के के पीछे का विचार मर्द को बचाना है। जी हां, उन्हें लगता है कि नारी का शरीर आकर्षक है। ये पुरुष की कामभावना को उकसाता है। लिहाजा उसका ढंका होना ही ठीक है। ये नजरिया सिर्फ इस्लाम का ही नहीं बल्कि सारे धर्मों का है। लेकिन इस्लाम में ये बाध्यता बन जाता है। अपनी किताब इनफिडेल की वजह से चर्चा में आई लेखिका अयान हिरसी अली का सवाल है।
क्या किसी मर्द को उसकी कामभावना से बचाना मेरी जिम्मेदारी है या उसे अपनी भावनाओं पर काबू रखना सीखना चाहिए?
अयान हिरसी अली का ये सवाल अब भी लाजवाब है। जाहिर है औरत की आजादी के लिए मर्द को अपने तकाजे तो बदलने होंगे। अब सवाल ये है कि हम अपनी मां, बहन, बेटियों को बुर्के पहनाएं या फिर अपने बेटों और भाइयों को अपने तकाजे बदलने की तालीम। इस खबर पर आप अपनी राय दें।
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