बरेली। गंगा जमुनी संस्कृति की निशानी बरेली शहर होली के बाद से ही 15 दिनों तक कर्फ्यू झेलता रहा। दंगे में किसी की जान तो नहीं गई, लेकिन माल का काफी नुकसान हुआ। सेक्युलर मिजाज के लिए मशहूर इस शहर के दामन पर ऐसा दाग लग लग गया, जिससे वो आजादी के बाद से बचता आया था।
होली के दूसरे दिन यानी 2 मार्च को सूरज ढलने के साथ- साथ शहर नफरत की इस आग में झुलस उठा। उस दिन बारावफात का जुलूस निकलना था। उसमें शामिल होने जा रही एक अंजुमन के रास्ते को लेकर गुद्दड़बाग मोहल्ले में विरोध हुआ। देखते-देखते मामले ने सांप्रदायिक रंग ले लिया। बीच का कोई रास्ता निकल पाता, इससे पहले ही कुछ पत्थर उछले और अमन का आईना चकनाचूर हो गया।
अफवाहों ने आग में घी का काम किया। जगह-जगह आगजनी, फायरिंग और तोड़फोड़ की वारदात हुई। प्रशासन ने चार थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू का एलान कर दिया। सुबह हुई तो खाक दुकानों के सामने हिंदू भी रो रहे थे और मुसलमान भी।
बहरहाल, शहर 15 दिनों तक पूरी तरह कर्फ्यू की गिरफ्त में रहा। दंगा करने के आरोप में पुलिस ने 300 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन शहर की फिजा में नफरत घुल चुकी थी।
काफी दिनों से हो थी माहौल खराब करने की कोशिश
बरेली को नजर एक दिन में नहीं लगी। वहां का माहौल खराब करने की कोशिश काफी दिनों से हो रही थी। इस कोशिश में हर रंग के कट्टरपंथी शामिल थे। दंगाइयों का एक जत्था, हिंदू-मुसलमान दोनों को निशाना बना रहा था। प्रशासन के रवैयै ने ऐसे लोगों का काम आसान कर दिया।
बरेली में लगी आग को बुझाने के लिए मौका पाते ही अमन पसंद लोग सड़कों पर उतरे। सबकी यही अपील थी कि बरेली अपनी गंगा-जमनी तहजीब को पहचाने। उन्होंने लोगों का दुख-दर्द करीब से जानने की कोशिश की तो कुछ अजब खुलासे हुए। पता चला कि कई जगह दंगाइयों का एक ही जत्था, हिंदू-मुस्लिम दोनों को निशाना बना रहा था।
जाहिर है साजिश गहरी थी। इसी सिलसिले में मौलाना तौकीर रजा खां का सामने आया। इत्तेहाद-ए-मिल्लत के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खां पर आरोप है कि उन्होंने बरावफात के जुलूस के लिए जुटी भीड़ को भड़काया। हालांकि मौलाना इसे गलत बताते हैं।
बहरहाल, प्रशासन ने दंगा भड़कने के छह दिन बाद मौलाना तौकीर को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन इससे माहौल बिगड़ने लगा तो उसके हाथ-पांव फूल गए। पुलिस ने कह दिया कि मौलाना के खिलाफ पर्याप्त सुबूत नहीं है। तीन दिन बाद मौलाना को जमानत मिल गई। मौलाना ने फिर अपनी ताकत दिखा दी।
कई साल से वो इसी में जुटे हैं। काफी पहले विश्व हिंदू परिषद की तर्ज पर उन्होंने मुस्लिम नौजवानों में त्रिशूल बंटवाए थे और फिर डेनिश कार्टूनिस्ट के सिर की कीमत सौ करोड़ लगाकर तमाम दूसरे बयानबाजों को उन्होंने पीछे छोड़ दिया था। जानकार मानते हैं कि मौलाना प्रचार की ताकत को समझ चुके हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का माहौल उन की मदद कर रहा है।
उधर, झगड़े की शुरुआत को लेकर कई भगवा संगठन शक के घेरे में हैं। बीजेपी एक पूर्व सभासद संजय राय को इस सिलसिले में गिरफ्तार भी किया गया है। बताया जाता है कि अंजुमन का रास्ता रोकने का मामला बड़े टकवार तक पहुंचे। इसके लिए पहले से तैयारी की गई थी। इसीलिए आग भड़कने के साथ ही शोलों को शहर के कोने-कोने तक पहुंचा दिया गया।
कभी अल्लामा इकबाल ने फरमाया था कि जम्हूरियत वो तर्जे हुकूमत है कि जिसमें बंदों के गिना करते हैं, तौला नहीं करते। लेकिन सियासत के सौदागरों ने इसका मतलब ये निकाला है कि खुदा के बंदे भेड़ बकरियां हैं जिन्हें जब चाहे, जिधर चाहे हांका जा सकता है। मजहबी उन्माद का इन्जेक्शन लगाकर सत्ता की देवी को खुश करने के लिए बलि चढ़ाया जा सकता है।
राजनीतिक दलों का रुख सवालों के घेरे में
बरेली का दंगे को लेकर राजनीतिक दलों का रुख सवालों के घेरे में है। कहा जा रहा है कि बीजेपी 20 साल बाद इस सीट पर हारी है और दंगे उसकी बौखलाहट का नतीजा है। उधर, कांग्रेस पर आरोप है कि वो राजनीतिक फायदे के लिए वोट के सौदागरों से रिश्ता जोड़ रही है।
बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार1989 के बाद 20 साल लगातार बरेली के सांसद रहे। लेकिन पिछले चुनाव में जब बगल के पीलीभीत से उठी वरुण गांधी की सांप्रदायिक ललकार से माहौल गर्म हो उठा था। गंगवार कांग्रेस के प्रवीण सिंह एरन से पराजित हो गए। उन्हें आज भी लगता है कि मौलाना तौकीर ने कांग्रेस से सौदा करके उन्हें हरा दिया।
जाहिर है, बीजेपी काफी दिनों से मौलाना तौकीर रजा को निशाने पर रखकर ध्रुवीकरण की कोशिश में जुटी है। तौकीर रजा के तीखे बयानों ने उसका काम आसान कर दिया है। उनके जलसे-जुलूसों में उमड़ी भीड़ के नाम पर भगवा संगठनों ने हिंदुओं के बीच डर बैठाने की लगातार कोशिश की। तौकीर रजा का साफ इल्जाम है कि गंगवार न हारते तो बरेली में दंगा न होता।
जाहिर है, ध्रुवीकरण की कोशिश में बीजेपी और मौलाना तौकीर, दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। संतोष गंगवार द्वारा संचालित अरबन कोआपरेटिव बैंक में मौलाना तौकीर शुरू से शेयर होल्डर हैं। दोनों इसे आम बात बताते हैं। उधर, उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही कांग्रेस मौलाना तौकीर को खासी अहमियत दे रही है।
मौलाना तो अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने का दावा भी कर रहे हैं। हालांकि कांग्रेस नेता इसे गलत ठहराते हैं और दंगे के लिए पूरी तौर पर बीजेपी को जिम्मेदार बताते हैं।
उधर, सूबे में सरकार चला रही बीएसपी भी मौलाना तौकीर रजा से पेंग बढ़ाने की कोशिश कर रही है। सबकी निगाह में 2012 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव हैं। सबको एकमुश्त वोट चाहिए। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण आसान जरिया है। बरेली जले तो जले।
हिंदू-मुसलमानों ने एकता की मिसालें कायम की
इसमें शक नहीं कि बरेली की आग ने काफी नुकसान किया, लेकिन वो इस शहर के सेक्युलर मिजाज को जला नहीं सकी। आला हजरत और नाथ गुरुओं की इस नगरी ने हिंदुओं और मुसलमानों ने एकता की तमाम मिसालें कायम की हैं। और इस बार भी ऐसे लोगों की कमी नहीं रही।
बरेली के लक्ष्मी नारायण मंदिर को पूरा शहर इसे चुन्ना मियां का मंदिर कहता है। वजह ये है कि बरेली की नामी शख्सियत सेठ फजलुर्रहमान उर्फ चुन्ना मियां ने इस मंदिर को बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया था। वे जयपुर से प्रतिमाएं खरीदकर लाए और मंदिर के लिए सबसे ज्यादा एक लाख दस हजार एक रुपये का चंदा दिया। यही नहीं खुद खड़े होकर मंदिर बनवाया।
960 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद इसका उद्घाटन करने बरेली आए थे। आज मंदिर में भगवान की तस्वीर के बगल में चुन्ना मियां की तस्वीर भी लगी है।
बरेली की दरगाह आला हजरत भी भाईचारे की मिसाल है। भारत में सुन्नी मुसलमानों की आस्था के इस सबसे बड़े केंद्र में हिंदू भी कम आस्था नहीं रखते।
बरेली का ये मिजाज दंगों के दौरान भी बरकरार रहा। अजीज मियां, कर्फ्यू के दौरान सिविल लाइंस के ब्रह्मदेव मंदिर को सुबह खोलने और साफ-सफाई की जिम्मेदारी उठाते रहे। वे मंदिर के पिछवाड़े रहते हैं और कर्फ्यू की वजह से पुजारी का पहुंचना मुश्किल था। उन्हें नहीं लगता कि बुतखाने की संभाल करके उन्होंने कुछ भी गलत किया।
उधर, जिस मोहल्ले कोहाड़ापीर में सबसे पहले माहौल खराब हुआ, वहां चालीस साल से प्रेस करके जिंदगी चलाने वाले नायाब रजा को सुरक्षित रखने में स्थानीय हिंदू लड़कों ने पूरी मुस्तैदी दिखाई।
बरेली को कौमी एकता की अपनी विरासत पर पूरा भरोसा है। उसे पता है कि इंसानियत सबसे बड़ा सबक है, चाहे वो दरगाह-ए-आला हजरत से मिले या फिर लक्ष्मी नारायण मंदिर से।
परिंदों में तो ये फिरकापरस्ती भी नहीं देखी, कभी मंदिर में जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे। बरेली का चुन्ना मियां का मंदिर बताता है कि ये परिंदों का शहर था, जिसे दरिंदों की नजर लग गई।
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