दंडकारण्य, आंध्र प्रदेश। जब सीता का अपहरण कर रावण पुष्पक विमान से लंका जा रहा था, तो सबसे पहले जटायु ने ही रावण से लोहा लिया था।
रावण से भीषण लड़ाई में जटायु बुरी तरह जख्मी हो गए। लेकिन उन्होंने तब तक शरीर नहीं छोड़ा, जब तक उन्होंने राम को सीताजी के बारे में नहीं बता दिया।
राम ने खुद जटायु का अंतिम संस्कार किया। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे।
यहां पर जटायु का मंदिर भी है। ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर में सिर्फ यही जटायु का एकमात्र मंदिर है। स्थानीय लोग बड़े ही भक्तिभाव से यहां पूजा करने आते हैं। कहते हैं इस जगह को स्थानीय भाषा में जटायु पाका यानी जटायु की टांग कहा जाता है।
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