कंधमाल। कहानी उड़ीसा के कंधमाल की है जहां एक फौजी अपने भाई के लिए इंसाफ मांग रहा है। उस भाई के लिए जिसे भगवा ब्रिगेड ने जिंदा जला दिया।
देश की हिफाजत के लिए मोतीलाल जान से खेल रहा था। कारगिल युद्ध में उसने दुश्मनों को घुटने टेकने को मजबूर किया। उधर वो सरहद की हिफाजत के लिए जान लड़ा रहा था और इधर धर्म के नाम पर भगवा आतंकवादी उसके घर को जला रहे थे और साथ में भगवा ब्रिगेड ने उसके भाई को भी जिंदा जला दिया।
मोतीलाल कोई आम आदमी नहीं देश के लिए जान की बाजी लगाने वाला वो सिपाही है जिसने करगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए।
मोतीलाल वो शख्स हैं जिसने नार्थ-इस्ट में उल्फा उग्रवादियों के दांत खट्टे कर दिए। लेकिन जिस वक्त ये जांबाज सरहद की हिफाजत में लगा था देश के ही कुछ लोग उसका घर उजाड़ने में लगे थे।
मालूम हो कि मोतीलाल के भाई रसानंदा जन्म से अपाहिज थे। भगवा आतंकवादियों के हमले के वक्त परिवार वाले भागने लगे लेकिन रसानंदा ने जाने से मना कर दिया। आतंक के सौदागरों ने रसानंदा को जिंदा फूंक दिया।
जले हुए घर में मोतीलाल अपने भाई के जिस्म के बचे हिस्से की तलाश में पहुंचे और आखिरकार उन्हें कुछ अस्थियां मिली जिन्हें ताबूत में रखकर उन्होंने अपने भाई का अंतिम संस्कार कर दिया।
अब सरहद का रखवाला देश से सवाल कर रहा है कि उसे ये कैसा इनाम दिया गया है। मोतीलाल का परिवार अभी भी शरणार्थी शिविर में गुजर कर रहा है। सुरक्षा कारणों से पीड़ित परिवारों को वापस गांव नहीं जाने दिया जा रहा।
45 दिन बाद जब मोतीलाल ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री और वहां के डीजी से गुहार लगाई तब कहीं जाकर उन्हें गांव जाने की इजाजत मिली। अब मोती लाल अपने भाई के लिए इंसाफ चाहते हैं पर उनके सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है।
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