नई दिल्ली। लोक लुभावन नुस्खों पर हांकी जा रही भारतीय रेलवे तकनीक के स्तर पर लगातार पिछड़ती जा रही है। एक तरफ तो उसे हवाई मार्ग और सड़क मार्ग से चुनौती मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ उस पर जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने का दबाव है। लेकिन देश की लाइफ लाइन मानी जाने वाली भारतीय रेल उम्मीदों के बोझ को नहीं उठा पा रही।
भले ही भारतीय रेल अपनी लंबाई-चौड़ाई और मुसाफिरों की तादाद को लेकर इतराए। लेकिन सुविधा, रफ्तार, सुरक्षा और क्षमताओं के मामले में दुनिया के छोटे-मोटे देशों के मुकाबले में भी ये कहीं नहीं ठहरती। साल 2009 में रेलगाड़ी में डकैती के 280 मामले और साल 2010 के नवंबर महीने तक 297 मामले दर्ज किए गए।

यही नहीं, साल 2009 में ट्रेन में हत्या के 20 मामले सामने आए तो 2010 में नवंबर तक 23 मामले सामने आए। 2009 में छेड़खानी के 55 मामले दर्ज किए गए तो 2010 के नवंबर महीने तक 40 मामले। 2010 में रेलवे 90 हादसों की शिकार हुई, इन हादसों में 302 लोगों की मौत हुई। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय रेल कितना पीछे है। रेलवे के टेक्निकल अपग्रेडेशन की कोशिश बीते 20 साल से नहीं हुई है।
रेलवे के पास आज जो एलएचबी कोट, रोलिंग स्टॉक, एयर ब्रेक प्रणाली, मॉडर्न कंक्रीट स्लीपर, लॉन्ग वेल्डेड रेल, मॉडर्न लोको इंजन, मॉडर्न रूट रिले इंटरलॉकिंग, ट्रैक सिग्नलिंग सिस्टम और पैनल इंटरलॉकिंग की तकनीक है, वो 20 साल पुरानी है। छोटे देशों में मालगाड़ियां 25 मीट्रिक टन एक्सेल लोड लेती हैं, उनकी रफ्तार 120-150 किमी प्रति घंटा होती है। जबकि भारतीय रेल की मालगाड़ियां 18 से 20 मीट्रिक टन लोड लेती हैं और रफ्तार 70-80 किमी प्रति घंटा होती है। दूसरे देशों में यात्री गाड़ियां 250-300 किमी की रफ्तार से चलती हैं और भारत में केवल 80-90 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलती है।
हालांकि ये और बात है कि रेलवे यात्री गाड़ियों के 110 से 140 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने का दावा करती है।
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