जनता अपनी बात कहेगी, खुलेआम चौराहे से
मेहनतकश का खून-पसीना, बोलेगा चौराहे से

पब्लिक का गुस्सा बोलेगा, हर इक गली-चौराहे से
जनता अपनी बात कहेगी, खुलेआम चौराहे से
सैंतालीस के बाद से अब तक, साल हैं 64 गुजर गए
चौराहों पर नेता आए, आए और फिर चले गए
अब आए तो लेके रहेंगे, हक अपना चौराहे से
जनता अपनी बात कहेगी, खुलेआम चौराहे से
जात-पांत और देश-धर्म की, न हों बातें भाषा की
सबको मिले हक सबको मौका, जिसने पढ़-लिख मेहनत की
कौन है वो जो जात-पांत पर, रोटी अपनी सेक रहे
हिम्मत है तो आकर अपनी, बात कहें चौराहे से
जनता अपनी बात कहेगी, खुलेआम चौराहे से
नाक कटेगी बेईमानों की, खुलेआम चौराहे से
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