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शिव-पार्वती के दर्शन के लिए कैसे पहुंचे कैलाश मानसरोवर

Posted on Jun 01, 2011 at 05:46pm IST

नई दिल्ली। कैलाश मानसरोवर की सबसे मुश्किल यात्रा शुरू हो गई है। हिंदुओं के लिए कैलाश मानसरोवर का मतलब भगवान का साक्षात दर्शन करना है। कैलाश मानसरोवर को ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पहाड़ों की चोटी वास्तव में सोने के बने कमल के फूल की पंखुड़ियां हैं जिन्हें भगवान विष्णु ने सृष्टि की संरचना में सबसे पहले बनाया था। इन पंखुड़ियों के शिखरों में से एक है कैलाश पर्वत। इस पर्वत पर भगवान शिव ध्यान की अवस्था में लीन हैं। उनके इस अध्यात्म से ही चारों तरफ वातावरण बेहद शुद्ध है और कहा जाता है कि अपनी किरणों से उन्होंने सृष्टि को संतुलित रखा हुआ है।

कहा जाता है कि कैलाश पर्वत पर साक्षात शिव और पार्वती निवास करते हैं। इस अद्भुत और अलौकिक नजारे को देखकर ही लोगों का शिव की मौजूदगी का मानो एहसास हो जाता है। सदियों से भक्त यहां अपने परमेश्वर की दर्शन करने के लिए आते हैं। जिंदगी में एक बार स्वर्ग में भगवान के दर्शन का एहसास यहीं मिलता है। इसलिए लोग हर साल हजारों की तादाद में अपने प्रिय शिव और पार्वती के दर्शन करने कैलाश आते हैं। लेकिन कैलाश मानसरोवर जाने का मन बनाने में और वहां तक पहुंचने में बहुत फर्क है। क्योंकि ये यात्रा बहुत मुश्किल कही जाती है। हिमालय की चोटियों के बीच से गुजरता ये रास्ता बेहद ही खतरनाक होता है। साथ ही मौसम बिगड़ने का खतरा अक्सर बना रहता है।

शिव-पार्वती के दर्शन के लिए कैसे पहुंचे कैलाश मानसरोवर

कैलाश पर्वत तक जाने के लिए दो रास्ते हैं। एक रास्ता भारत में उत्तराखंड से होकर गुज़रता है लेकिन ये रास्ता बहुत मुश्किल है क्योंकि यहां ज़्यादातर पैदल चलकर ही यात्रा पूरी हो पाती है। दूसरा रास्ता जो थोड़ा आसान है वो है नेपाल की राजधानी काठमांडू से होकर कैलाश जाने का रास्ता। भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने भक्तों के लिए जून से सितंबर तक के लिए अपना रास्ता खोल दिया है।

हम आपको बताते हैं कि नेपाल के रास्ते भगवान शिव के घर कैलाश मानसरोवर कैसे पहुंचे।

यात्रा का पहला दिन

सबसे पहले दिल्ली में सारी औपचारिकताएं पूरी की जाती है फिर हेल्थ चैकअप के बाद आपको सीधे काठमांडू ले जाया जाएगा। आप चाहें तो काठमंडू में एक दिन रुक कर अगले दिन से यात्रा आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन अक्सर लोग यहां पशुपतिनाथ जी के दर्शन के बाद ही कैलाश के दर्शन के लिए आगे का सफर शुरू करते हैं।

यात्रा का दूसरा दिन

काठमांडू से सुबह-सुबह कैलाश के लिए सफर शुरू हो जाता है। काठमांडू से तकरीबन एक घंटे की यात्रा के बाद फ्रेंडशिप ब्रिज पर मानसरोवर यात्रियों की यहीं पर कस्टम क्लियरेंस और पासपोर्ट की जांच चीनी अधिकारी करते हैं। यह पुल नेपाल-चीन की सीमा पर है और सभी कागजात की जांच होने के बाद यात्रा आगे बढ़ती है। यात्रा का पहला पड़ाव नायलम होता है। नायलम तिब्बत में है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 3700 मीटर है। नायलम पहुंचने के बाद अक्सर लोग एक दिन यहां अपने शरीर को वातावरण के अनुकूल करने के लिए रुकते हैं।

यात्रा का तीसरा दिन

कहते हैं कि आस्था में इतनी ताकत होती है कि मुश्किल से मुश्किल रास्ता भी आसान हो जाता है। और श्रद्धालुओं को इसका एहसास भी होने लगता है। गाड़ी से आपको कारवां प्रतिदिन 260-270 किलोमीटर की दूरी तय करने का लक्ष्य लेकर चलता है। दूर-दूर तक फैला सन्नाटा और वीरानी, खामोशी का ऐसा मंजर पैदा कर देती है कि हर यात्री खुद-ब-खुद खामोश भगवान शिव के एहसास को महसूस करने लगता है। शाम तक आप सागा पहुंचेंगे।

यात्रा का चौथा दिन

सागा से चौथे दिन आपका सफर प्रयाग के लिए शुरू हो जाएगा। सागा से प्रयाग की दूरी 270 किलोमीटर के करीब है। दस घंटे की यात्रा के बाद प्रयाग में रात बितानी पड़ती है। चारों और अद्भुत नजारा और भगवान शिव के दर्शन की ललक शायद ही आपको थकान का एहसास भी होने देगी। क्योंकि पांचवें दिन मानसरोवर के दर्शन के होने वाले हैं।

यात्रा का पांचवां दिन

दिल्ली से महज चार दिन के सफर के बाद पांचवें दिन आप अद्भुत, अनोखा, पारलौकिक और एहसास की धरती मानसरोवर झील के सामने होंगे। मानसरोवर की छटा ही निराली होता है। दूर-दूर गहरा नीला पानी शान्त, निर्मल व स्वच्छता से परिपूर्ण फैला होता है और सामने ही होता है ओम पर्वत। 85 किलोमीटर में फैले मानसरोवर झील की विशालता ये एहसास कराती है कि धरती पर अगर स्वर्ग है तो कैलाश में ही है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी शेषनाग की शय्या पर मानसरोवर पर विश्राम करते हैं। यही नहीं, ओम पर्वत की छटा देखकर आपको यूं लगेगा मानो साक्षात शिव अपनी छटा बिखेर रहे हैं। मानसरोवर के इस किनारे से कैलाश पर्वत का दक्षिणी हिस्सा दिखाई देता है।

मानसरोवर में स्नान करने का अद्भुत अनुभव अलौकिक होता है। लेकिन यहां से ओम पर्वत के दर्शन के बाद एक ललक जाग जाती है शिव और पार्वती के दर्शन की। कैलाश की परिक्रमा करने की। इसके लिए पहले मानसरोवर झील से 60 किलोमीटर दूर तारचंद का बेस कैम्प आपको पहुंचना होगा। वहां से सभी यात्रियों को कैलाश पर्वत की परिक्रमा करने की तैयारी करनी होती है और परिक्रमा आप या तो पैदल कीजिए या फिर घोड़े की सवारी के जरिए। 54 किलोमीटर की परिक्रमा करना आसान नहीं होता है, लेकिन कैलाश के आसपास का वातावरण ही इतना अद्भुत होता है कि आपको न तो थकान का एहसास होगा और न ही किसी डर का।

कैलाश दर्शन का छठा दिन

19800 फीट की ऊंचाई, फिर रास्ता सीढी़ की तरह कभी ऊंचाई तो कभी एकदम ढलान। समुद्रतल से ऊंचाई अधिक होने के कारण वहां ऑक्सीजन की थोडी कमी है। कई यात्रियों को सांस लेने में तकलीफ होने लगती है लेकिन उनके लिए ऑक्सीजन सिलेंडरों का इंतजाम होता है।

कैलाश दर्शन का सातवां दिन

मानसरोवर से तारचेन के लिए जाना होगा जो 40 किलोमीटर दूर है। ये कैलाश मानसरोवर की परिक्रमा का बेस कैंप माना जाता है। देहारा पुक के लिए पदयात्रा शुरू करनी होगी जहां की वादियों में आपको बेहद पवित्र अनुभव होने लगेगा। आसापास झरने और ठंडी हवाएं आपकी सारी थकान मिटा देंगी और आपकी पद यात्रा को सुखद बनाएंगी, जैसे ही जैसे आप आगे बढ़ते जाएंगे कैलाश पर्वत का मुख आपको नज़र आने लगेगा। परिक्रमा के दूसरे दिन आपको गौरी कुण्ड के दर्शन होंगे। माना जाता है कि माता पार्वती इसी कुण्ड में स्नान करती हैं। पुराणों में लिखा है कि गौरी कुण्ड के जलस्पर्श मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। स्नान के बाद परिक्रमा फिर से शुरू हो जाती है। इस दिन 24 किलोमीटर की दूरी तय की जाती है। परिक्रमा के दौरान कैलाश पर्वत के पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी मुख के दर्शन होते हैं।

यकीन मानिए, सोने की चमक और चांदी की आभा कैलाश पर्वत पर देखकर आपको वापस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में वापस लौटने का शायद ही मन करे। ये दिन सबसे मुश्किल लेकिन बेहद आध्यात्मिक और मन को शांति देने वाला होने वाला है। डोलमा ला पास पहुंचने के लिए आपको यमस्थल से शिवस्थल तक पहुंचना होगा, यहां पहुंचते ही आप बस सब कुछ भुला कर आंखें बंद करके बैठ जाइए। आपको लगेगा आप स्वर्ग में आ गए हैं और इतनी शांति शायद ही आपके मन को और कहीं नसीब हो पाई होगी।


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