पटना। सरकार गरीबों के लिए तमाम योजनाएं बनाती है, जो अगर ठीक ढंग से लागू की जाएं तो वाकई चमत्कारी बदलाव लाए जा सकते हैं। लेकिन अफसोस ये कि ये योजनाएं जरूरतमंदों तक पहुंचती ही नहीं है। उनके हक का पैसा बीच में ही डकार लिया जाता है, और उनके हिस्से आती है सिर्फ गरीबी। सीजे की टीम ने बिहार के एक गांव का दौरा किया और जहां दो ग्रामीण सीजे बनकर अब इंसाफ़ की गुहार लगा रहे हैं।
राज्य की राजधानी पटना से महज़ 45 किलोमीटर की दूरी पर चियनतार गांव है यहां के लोग ख़ामोशी से बदहाल ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। 2000 की आबादी वाले इस गांव में ज्यादातर लोग पिछड़ी जातियों के हैं। सरकारी योजनाओं का फ़ायदा यहां के लोगों तक नहीं पहुंच ही नहीं पाता है। आईबीएन7 के सिटीजन जर्नलिस्ट बने जगमोहन महतो गांव के और पुरुषों की तरह ही रेत खनन का काम करते हैं। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद ये 100 से 150 रुपए कमा पाते हैं। लेकिन परिवार के पांच सदस्यों के लिए ये काफी नहीं है। ये काम सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत हो रहा था। मनरेगा के तहत इन्हें जॉब कार्ड मिलना था और साथ 100 दिन का काम और हर दिन के काम के एवज़ में 100 रुपए मिलने थे।

जगमोहन का कहना है कि पिछले साल सितंबर महीने में एक समाज सेवी उनके गांव में आए और उन्होंने कंप्यूटर पर मनरेगा की साइट दिखाई। जिस देखकर जगमोहन दंग रह गए। उस पर लिखा था कि जगमोहन पिछले तीन साल से अलग-अलग सरकारी योजनाएं के तहत काम कर रहा है। रिकार्ड में ये भी लिखा था कि उन्हें वक्त पर पूरा पैसा भी मिलता रहा है। साइट पर दिखाया गया है कि उन्हें तकरीबन 8000 रुपए का भुगतान किया जा चुका है जो बिल्कुल झूठ है।
सीजे टीम की मदद से जगमोहन ने मुखिया के बेटे से जवाब मांगा। उसने किसी भी तरह की धांधली से साफ़ इनकार किया और उल्टा उनपर दोष डाला दिया। जिसके बाद उन्होंने प्रोजेक्ट अफसर रश्मि रंजन से मुलाकात की। सीजे की रिपोर्ट ये साफ़ करती है किस तरह मनरेगा में खुले आम धांधली हो रही है। लेकिन ये सिर्फ़ मनरेगा की कहानी नहीं है बल्कि हर सरकारी योजना इसी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है।
इसी गांव की रहनेवाली धनरजिया देवी के परिवार में 12 लोग हैं। धनरजिया के पति और बेटा ही सिर्फ़ कमाने वाले हैं। इनका पूरा परिवार बीपीएल कार्ड से मिलने वाले राशन पर निर्भर है। लेकिन इन्हें राशन कभी भी समय पर नहीं मिलता है। डीलर अपनी मर्जी से दुकान खोलता है, और वो ज्यादा पैसा वसूलता है। दुकान पर ज्यादातर रेट लिस्ट भी नहीं लगी होती है।
दरअसल बीपीएल स्कीम के तहत इस परिवार को हर महीने 14 किलो गेहूं 2 रुपए प्रति किलो की दर से और 21 किलो चावल 3 रुपए प्रति किलो के कीमत से, यानी कुल मिलाकर 35 किलो मिलने हैं। लेकिन डीलर अकसर इन्हें सिर्फ 30 किलो चावल या गेहूं लेने के लिए कहता है और वो भी ज्यादा कीमत पर। यही नहीं, राशन की दुकान महीने में सिर्फ़ एक दिन खुलती है। जिस दिन सीजे की टीम दुकान पर पहुंची तो राशन बंट रहा था, लेकिन अगले ही दिन ये बंद हो गया।
धनरजिया का कहना है कि वो लोग राशन डीलर से बहस नहीं कर सकते क्योंकि अनाज के लिए उस पर निर्भर हैं। मुखिया को इन लोगों की परेशानी मालूम है, लेकिन वो भी इसे नज़रअंदाज़ करते हैं। सीजे टीम स्कीम के मार्केटिंग अफसर शशिभूषण कुमार से मिली। ये परिवार आईबीएन7 की सीजे टीम के माध्यम से अपनी हक को मांग रहा है।
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