बैंगलोर। अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए परीक्षित दलाल सिटिजन जर्नलिस्ट बने। उनका आरोप है कि बैंगलोर के एक अस्पताल की लापरवाही की वजह से उनकी पत्नी कपाली और अजन्मे बच्चे की मौत हुई। 16 अप्रैल 2010 को कपाली को सिजेरियन ऑपरेशन के लिए ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। साढ़े 10 बजे डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने कहा कि उसे एनेसथिसीया से रिएक्शन हो गया है और 12 बजकर 20 मिनट पर उसकी मौत का एलान कर दिया गया। वो परीक्षित के बच्चे को भी नहीं बचा सके।
इस हकीकत को बर्दाश्त कर पाना परीक्षित के लिए लिए मुश्किल था, लेकिन अस्पताल के रवैये से उन्हें गड़बड़ी का अंदेशा होने लगा। तब उन्होंने FIR दर्ज कराई और अलगी ही सुबह शव को पोस्टमॉर्टम कराया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने परीक्षित हिला दिया। रिपोर्ट में लिखा था कि उसकी मौत शॉक और हेमेरेज की वजह से हुई। जबकि अस्पताल का दावा था कि उसकी मौत एनेस्थीसिया की वजह से हुई है।
परीक्षित ने तय कर लिया कि वो दोषियों को सज़ा दिलाएंगे और इसलिए उन्होंने अस्पताल के खिलाफ केस कर दिया। अगस्त 2010 में ये केस CID को सौंप दिया गया, जिसने मेडिकल स्टाफ के खिलाफ चार्जशीट बनाई। लेकिन इसके बावजूद KMC ने डॉक्टरों को सस्पेंड करने से इनकार कर दिया।

इतना वक्त गुज़र जाने के बावजूद अभी कुछ नहीं हुआ है। MCI के सेक्रेटरी अभी भी वही जवाब दे रहे हैं, जो उन्होंने कई महीने पहले दिया था। पिछले 6 महीने से KMC निष्क्रिय है। किसी को नहीं मालूम को नई काउंसिल कब बनेगी, क्योंकि हाल में हुए उनके चुनाव में काफी विवाद हुआ है। MCI भी परीक्षित का केस लेने में टालमटोल कर रही है। इंसाफ की आस लिए वो अभी भी केवल इंतजार ही कर रहे हैं।
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