इंफाल। मणिपुर की राजधानी इंफाल के लिए असलहों से लैस जवान और बख्तरबंद गाड़ियां आम बात हैं। एक पूरी पीढ़ी ने तो संगीनों के साये में ही उम्र गुजार दी। चहल-पहल से भरे बाजार शाम ढलते ही सन्नाटे में डूबने लगते हैं। हर एक को घर वापसी की जल्दी होती है। आम मणिपुरी दोहरे डर में जीता है। एक ओर उग्रवादी तो दूसरी ओर सुरक्षा बलों की संगीनें जिन्हें विशेषाधिकार हासिल हैं। 1949 में मणिपुर स्वतंत्र भारत के नक्शे पर आया। पहाड़ और घाटी के 9 जिलों में बंटे इस छोटे से राज्य में इलाकाई और जातीय गुटबंदी के चलते हिंसक टकराव शुरू हुए। नगा, कुकी और मैती जातियों के यहां 30 से ज्यादा उग्रवादी संगठन हैं। इनके लगातार टकराव से मजबूर सरकार ने 1979 में यहां आर्म्स फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट लागू कर दिया।
इस एक्ट के तहत सेना और सुरक्षा बलों को संदेह होते ही गोली मारने का अधिकार होता है। इस एक्ट के चलते उग्रवाद पर थोड़ा अंकुश तो लगा मगर जल्द ही गोली के शिकार आम आदमी भी होने लगे। आम मणिपुरी की हिफाजत के लिए लागू कानून ही उन्हें शैतान की तरह दिखने लगा। इसी कानून के सफाए के लिए इरोम शर्मिला बीते ग्यारह साल से अनशन पर हैं। शर्मिला को लेकर घर के भीतर भी बातें होती हैं।

जाहिर है लोग खुलकर भले न बोलें मगर 'एफ-स्पा' उनके लिए अब भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है। जहां तक उग्रवादी संगठनों का सवाल है तो उनमें से ज्यादातर भ्रमित हैं। उन्हें नहीं पता कि वो सरकार से लड़ रहे हैं, सुरक्षा बलों से लड़ रहे हैं या फिर आपस में ही एक-दूसरे से।
मणिपुर जातीय आधार पर तीन गुटों में बंटा है। मैती, नगा और कुकी। इनमें सबसे अधिक प्रभावशाली जाति है मैती। मैती उग्रवादी गुटों में कुछ तो अलगाववाद के समर्थक हैं। दूसरी और है नगा जो उखरूल, सेनापती, चांडल चूड़ाचंद्रपूरा और तमेलांग के हिस्सों को नागालैंड में मिलाना चाहते हैं। तीसरी ओर कुकी जाति है जो खुद अपने वजूद के लिए नगा गुटों से लड़ती रहती है।
बीते साल तकरीबन 6 महीने तक चला मणिपुर का कुख्यात इकोनॉमिक ब्लॉकेड-यानि आर्थिक नाकाबंदी इसी का नतीजा थी। इस नाकाबंदी से मणिपुर अब तक उबर नहीं पाया है। शुरुआत में कुसी संगठनों ने सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट के निर्माण की मांग करते हुए नेशनल हाईवे 37 को ब्लॉक किया। विरोध में नगा संगठनों ने भी जवाबी ब्लॉकेड शुरू कर दिया। मणिपुर के लोगों ने वो दिन भी देखा जब 400 रुपए का गैस सिलेंडर 1600 रुपए तक और पेट्रोल 150 से 160 रुपए लीटर तक बिका। बिजली भी यहां 24 घंटे में बामुश्किल 6 घंटे ही आती है।
रोजमर्रा का बाजार भी यहां सस्ता नहीं है। उग्रवादी संगठन हाईवे पर अवैध वसूली करते हैं। ये वसूली खुद-ब-खुद सामानों की कीमत में शामिल हो जाती है। लिहाजा आम मणिपुरी रोजमर्रा की चीजों के लिए भी जद्दोजहद करता है। जब आर्थिक हालात ऐसे हों तो पैसे की कीमत अपने आप बढ़ जाती है, लिहाजा चुनावों में वोटों की खरीद-फरोख्त भी खूब होती है। इसलिए बंदूक की नाल और जातीयता की उग्र भावना के बाद मणिपुर के चुनाव पर सबसे अधिक नोट ही असर डालते हैं।
उम्मीदवारों पर खर्च दोहरा है। एक तरफ वो वोट हासिल करने के लिए वोटर को पैसा देता है तो दूसरी ओर चुनाव में मदद के लिए उग्रवादी संगठनों को। ये संगठन उसे नोट के बदले अपने असर वाले वोट की गारंटी भी देते हैं। लेकिन कई बार मामला सीधे सीधे वसूली का भी हो जाता है। खबर है कि इस चुनाव में भी उग्रवादी गुटों की वसूली जारी है। इस बार मैती गुट कांग्रेस से नाराज चल रहा है। एक गुट ने तो धमकी भी दी कि जो कांग्रेसियों के साथ दिखेगा उसकी खैर नहीं। इस धमकी के बाद तमाम उम्मीदवारों की सुरक्षा बढ़ाई गई।
मगर सुरक्षा बढ़ाने के बावजूद मुख्यमंत्री ओकराम ईबॉबी सिंह के करीबी एल जयंत कुमार के घर हमला हो गया। हमले में बाल-बाल बचे जयंत कुमार की क्षतिग्रस्त कार पूरी कहानी बयान कर रही है। कांग्रेस लगातार उग्रवादी संगठनों को मनाने में जुटी है। खबर है कि उग्रवादियों ने कांग्रेस से 2 सौ करोड़ रुपये की मांग की है। हालांकि कांग्रेस इसे स्वीकार नहीं कर रही है लेकिन जानकार मानते हैं कि तोल-मोल तेजी पर है।
27 लाख की आबादी, 9 जिले, 60 विधानसभा सीटें और छोटे बड़े 30 से ज्यादा उग्रवादी संगठन। बुनियादी सुविधाओं का बेतरह अभाव तथा विकास के नाम पर कुछ भी खास नहीं। बावजूद इसके दो बार से कांग्रेस सत्ता में है। कांग्रेस के पास मौजूदा विधानसभा में कुल 31 सीटें हैं। मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी इस बार भी कुछ वैसा ही करिश्मा दोहराना चाहते हैं लेकिन लोग मानते हैं कि इस बार कांग्रेस की डगर कठिन हो सकती है।
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