संजय सुरी
लंदन। 27 साल पहले भोपाल में हुए भीषण गैस कांड के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड की मौजूदा मालिक डाउ केमिकल लंदन ओलंपिक की प्रायोजक बनी रहेगी। ओलंपिक के आयोजकों ने कंपनी को हटाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। मगर इसके साथ ही डाउ को मिला ठेका सवालों के घेरे में आ गया है। ब्रिटेन के कुछ सांसदों ने डाउ को मिले ठेके में फर्जीवाड़े का आरोप लगाया है।

डाउ को दिए गए कॉन्ट्रेक्ट के बारे में ओलंपिक कमिश्नर की समिति को बताया ही नहीं गया था। इससे पहले ये कॉन्ट्रेक्ट एक ब्रिटिश कंपनी को दिया गया था। मगर ना जाने क्यों फिर से टेंडर निकाले गए और 10 दिन बाद ही ठेका डाउ के हिस्से आ गया। आरोप है कि ऐसा अंतर्राष्ट्रीय ओलंपकि कमेटी के दबाव में आकर किया गया।
लेबर पार्टी नेता कीथ वाज और टेसा जोवेल ने उस प्रक्रिया की जांच की मांग की है जिसके तहत डाउ केमिकल्स को प्रायोजक बनाया गया था। इसके अलावा खेल निगरानी आयोग के 12 कमिश्नरों मे से एक मेरेडिथ एलेक्जेंडर ने भी इस्तीफा दे दिया है।
ओलंपिक समिति के इस फैसले पर भारत ने भी कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। भारतीय ओलंपिक संघ ने एक बार फिर अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को चिट्ठी लिखकर डाउ को बाहर करने की मांग की है। वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिवराज सिंह चौहान ने भी इस फैसले की आलोचना की है।
डाउ को कॉन्ट्रेक्ट देने में धांधली हुई है या नहीं ये तो अपराध है ही मगर भोपाल की त्रासदी के लिए जिम्मेदार कंपनी को ओलंपिक का हिस्सा बनाना इस आंदोलन पर सवाल उठाता है क्योंकि ये आंदोलन ही मानवाधिकारों और वैश्विक भाई चारे को लेकर खड़ा हुआ है तो क्या ओलंपिक के अलंबरदारों को इसकी कोई परवाह नहीं?
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