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दवा परीक्षण के लिए जिंदगी का सौदा कर रही हैं कंपनियां

Posted on Jan 29, 2012 at 09:24pm IST | Updated Jan 29, 2012 at 10:23pm IST

आशीष कुमार पांडे

हैदराबाद। आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले के इस गांव में सन्नाटा पसरा है। 55 साल की एक महिला की मौत से लोग सदमे में हैं। कुछ महीने पहले उस महिला को एक कंपनी दवाओं की जांच के लिए ले गई थी। 10 दिन तक उसे अलग अलग दवाएं दी गईं और जब वो लौटी तो फिर कभी ठीक नहीं हो पाई। जोड़ों में भयानक दर्द, हमेशा आंखों के सामने अंधेरा सा रहना, उल्टियां। पिछले कुछ महीनों में इस गांव के आसपास की 6 महिलाएं दवा कंपनियों की लैब से आने के बाद अपनी जान गवां चुकी हैं।

दवा परीक्षण के लिए जिंदगी का सौदा कर रही हैं कंपनियां

आंध्र प्रदेश देश में क्लीनिकल ट्रायल का बड़ा बाजार बनता जा रहा है। दवा कंपनियों के गोरखधंधे का पर्दाफाश करने के लिए आईबीएन 7 की तहकीकात हैदराबाद से शुरू हुई। हम ऐसे लोगों की तलाश में थे जो हमें उस खौफनाक सच्चाई के बारे में बता सकें जिसकी कीमत आज देश में 2500 करोड़ रुपए से ज्यादा की हो चुकी है।




अपने खुफिया कैमरे के साथ आईबीएन 7 की टीम पहुंची हैदराबाद विधानसभा के आसपास फैले पब्लिक गार्डन। हमें पता था कि रिसर्च के नाम पर इस इलाके में दवा कंपनियों के दलाल घूमते हैं। उन दलालों का शिकार बनने वाले आम इंसान भी यहीं मिलते हैं। मन में सवाल था कि आखिर वो कौन से लोग हैं जो इंसान को गिनी पिग बनाने से नहीं हिचकते, आखिर किस हालात में लोग जानते बूझते खुद के शरीर पर परीक्षण के लिए तैयार हो रहे हैं।

हमने खुद को एक दवा कंपनी का एजेंट बताया और पब्लिक गार्डन के तय ठिकाने पर कुछ इंसानों की मांग की जिन पर नई दवाओं की रिसर्च की जा सके। देखते ही देखते दलाल की फौज हमें घेरकर खड़ी थी।

दलाल- रिसर्च के लिए कितने लोग चाहिए

रिपोर्टर- दस बारह हो जाएं तो बैटर है...नहीं तो कम से कम 5-6 चाहिए मेरे को..

दलाल- मिल जाएगा...

रिपोर्टर- और क्या पुलिस वगैरह की टेंशन..

दलाल- देखो मैं उधर बात नहीं करने का.. आपको बोला मैं..10-12 करके बोलके..ये जो जितना रहते हैं सब लाइसेंस वाले रहते हैं और अपुन को किसी की जबर्दस्ती नहीं है..

रिपोर्टर- लैब में जाने वाले लोगों के पास लाइसेंस है..

दलाल- उनको लाइसेंस नहीं देता.. उनका लाइसेंस है.. ये अपनी मर्जी से जाते हैं..अंदर एक फोटो ले लेते हैं.. सैटिंग करके जो उनको पूरा अमाउंट है वो देते हैं.. उनकी मर्जी से उसमें पिक करके, जिसका पास हुआ, उसको बुलाते हैं.. रेडी होने से पहले थोड़ा अमाउंट देते हैं 2000 वगैरह..

रिपोर्टर- टोटल कितना देते हैं..

दलाल- अभी सिस्टम अलग रहता है..250ml खून का..5-6 बार लेना होता है.. उसको 7 हजार देते हैं.. अगर 300ml का या 350ml का लेना होता है तो 15 (हजार) तक जाता है.. और ये सब अनपढ़ लोगों का रहता है..मेन पढ़ाई का, स्टूडेंट क्लास का तो 15 से 30 (हजार) का भी है..

रिपोर्टर- और जो यहां पर रहते हैं, मजदूर लेबर क्लास के?

दलाल- जो अनपढ़ रहते हैं उनको 5 हजार, 6 हजार, 7 हजार में चले आते रहते हैं क्योंकि उनको पढ़ाई नहीं आती, प्रूफ नहीं रहता है..

रिपोर्टर- कौन सा लैब लेकर जाते हैं..

दलाल- (***) में ले जाते हैं.. (***) में है.. अमीरपेट में चौरस्ता में (***) है.. चेर्नोपल्ली में (***) आजकल अब मद्रास भी जा रहे हैं लोग..

इसका मतलब है कि इंसानी शरीर की सौदेबाजी पूरे आंध्र प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में जारी है और इसकी एक मंडी है सूबे की विधानसभा के बाहर वो जगह जो आम आदमी को उम्मीद बंधाती है कि उसके अधिकारों के लिए आवाज उठाई जाएगी लेकिन इसी के बाहर उसके अधिकारों को कुचला जा रहा है। खुलआम घूमते दलाल पेट की आग बुझाने में नाकाम लोगों का सौदा कर रहे हैं।

विधानसभा के नजदीक मिले इन दलालों से हमने 10-12 ऐसे लोगों को इकट्ठा करने को कहा जिन पर नई दवा की रिसर्च की जा सके। ऐसा लगा ये उसके रोज का काम हो। उसने हमें शाम को विधानसभा परिसर के जुबली हाल के पास मिलने के बुला लिया। शाम को करीब 8 बजे आईबीएन 7 की टीम तय जगह पर पहुंच गई। यहां करीब एक दर्जन मजदूर मौजूद थे।

रिपोर्टर- अच्छा वहां क्या कैसे हुआ था..

मजदूर- फॉर्म भरा था, उस टाइम कुछ और लेते नहीं थे..फॉर्म भरा, वेट करा, एक्सरा हए, यूरीन लिया.. कहा चिकन-मीट खाते हो.. मैंने कहा- दवा खाता हूं, गार्डन-वार्डन में जो काम मिलता है.. कहे-सादी खाने का.. तो हम ये नॉन वेज ही ज्यादा चलता है..

रिपोर्टर- हां कहां के रहने वाले हो..

मजदूर- इटावा

रिपोर्टर- यहां कितने टाइम से हो..

मजदूर- अभी मेरे को 3 महीने हुए.. पहले कराके गए थे, 7 महीने घर पर रहकर आए

रिपोर्टर- तो वहां कुछ दवाएं वगैरह दी थीं.. क्या करते थे

मजदूर- एक कैप्सूल दिया था, फिर नींद ही नींद आ रही थी और बस काम चल रहा था बराबर..

रिपोर्टर- तो आपको कैप्सूल दिया और पता नहीं था कि क्या हुआ..

मजदूर- पता तो सब था

रिपोर्टर- कितने टाइम, कितने दिए थे

मजदूर- मतलब 7 दिन के बाद बाहर आया था, 3 दिन का गैप दिया था बीच में, जो 750 रुपए दिए थे वो उनने कही थी-मीट-वीट, जूस-वूस पीना दबा के.. मैंने कही-ठीक है.. जूस तो मेरा दूसरा ही होता है.. जूस कहां पीता हूं..

रिपोर्टर- कितना पैसा मिला था आपको

मजदूर- मेरे को उनसे मिला था 5600, 240ml

रिपोर्टर- उसके बाद वहीं पर रहे आप.. वहां पर दूसरी बार में क्या किया था..

मजदूर- दूसरी बार में वही मतलब..वो लगाते हैं फेंफड़े-वेफड़े.. फिर यहां फिर यहां.. फिर चिकना-चिकना सा होता है.. ऐसे लगाते हैं..फिर इसमें लगाते हैं.. पैर और हाथ में लगाते हैं..

रिपोर्टर- आपने पूछा नहीं कि क्या कर रहे हैं आपके साथ.. बस पैसा देखा आपने..

मजदूर- बस मेरे को तो यही पता था..

सिर्फ पैसों के लिए ये लोग अपनी जिंदगी अनजान हाथों में सौंपने पर मजबूर हैं। इन्हें इस बात की भी फिक्र नहीं कि दवा के परीक्षण के बाद उन्हें खतरनाक बीमारियां हो सकती हैं। इन्हें तो बस इतना मालूम है कि अगर वो सौदा नहीं करेंगे तो शाम को इनके घर चूल्हा नहीं जलेगा।

अगले दिन हम फिर पहुंचे उसी जगह। हम ये देखकर चौंक गए कि हमारे सामने जो लड़के मौजूद थे उनकी उम्र महज 18 से 20 साल थी।

रिपोर्टर- चेन्नई में कौन सा लैब है..

मजदूर- लैब का नाम नहीं मालूम

रिपोर्टर- क्या क्या वहां होता है, कैसे होता है.. तुम लोग यहां से गए ट्रेन से.. ट्रेन में बिठाया.. उसके बाद क्या होता है..

मजदूर- वहां पे ले गए, दवा पी, टेस्टिंग के लिए थोड़ा खून लेता, बाद में पेशाब लेता, उस सबके बाद में आधा-एक घंटा रुकना पड़ता है, टेस्टिंग करना पड़ता है कि कोई सा बीमारी होइगा तो बताता, फेल कर देता, फिर नहीं लेता अंदर..

रिपोर्टर- फिर वो कितने दिन थे वहां पर

मजदूर- अंदर जाने के बाद 24 घंटा लगता.. खाना-पीना खिलाता.. कितना.. 280ml लेगा तो आधा निकाल लेता 24 घंटे में.. और आधा रखता और आधा दूसरे पीरियड के लिए.. बाद में आधा पेमेंट देता और छोड़ देता..3-4 दिन, 10-12 दिन का गैप देता..

रिपोर्टर- उसके बाद दोबारा जाते हैं और क्या दवाई वगैरह देते हैं

मजदूर- टैबलेट देते हैं

रिपोर्टर- कितना टैबलेट खिलाते हैं दिन में

मजदूर- एक ही खिलाते हैं..

रिपोर्टर- उसके बाद क्या होता है, टैबलेट खिलाने के बाद क्या होता है

मजदूर- कुछ भी नहीं होता

रिपोर्टर- नींद-वींद आती है, टैबलेट खिलाकर टेस्टिंग करते रहते हैं.. कितने डॉक्टर्स वगैरह रहते हैं.. और कितना पैसा दिया था तुम्हें..

मजदूर- 5 हजार

रिपोर्टर- नासिर तुम गए थे, तुम्हारे साथ क्या हुआ.. अच्छा सेम-सेम.. दवाईयां खिलाईं.. कुछ तुमको पूछताछ.. पूछते भी हैं कि दवाई खाने के बाद..

मजदूर- ये जैसे कि नाम क्या है.. क्या-क्या दर्द होता है, परेशानी की बात.. कुछ हो रहा है अंदर क्या.. कुछ हो रहा है तो बोलो उनको.. पूछते रहते हैं.. कुछ हो रहा है तो पैसे देकर वापस भेज देते हैं.. पेमेंट देकर भेज देते हैं..

रिपोर्टर- और कुछ साइन-वाइन होती है.. अंग्रेजी पढ़ते हो.. उसमें क्या-क्या लिखा रहता है फॉर्म में..

मजदूर- ये लिखा रहता है कि आप जो कर रहो हो, अपनी मर्जी से कर रहे हो..

रिपोर्टर- तुम्हारे साथ कितने लोग गए थे हैदराबाद से चेन्नई..

मजदूर- 15-20 लड़के गए थे.. उसमें से 10 फेल हो गए

रिपोर्टर- अच्छा 5 ही बचे थे..

मजदूर- अजय नाम का लड़का ले गया था

रिपोर्टर- अच्छा अजय ले गया था.. तो अजय से मुलाकात होता रहता है

मजदूर- अजय मिलता है, यहीं आता रहता है

रिपोर्टर- और कौन ले जाता है..

मजदूर- वो अजय ही

रिपोर्टर- पहली बार कैसे गए थे तुम लोग.. तुम लोगों को कैसे पता चला कि जाना है..

मजदूर- अजय और जावेद बोलके एक लड़का है.. उससे बात कराई..

रिपोर्टर- क्या कमीशन दिया

मजदूर- जावेद को 450 रुपए दिया

रिपोर्टर- अच्छा जावेद को 450 रुपए एक लड़के का..

मजदूर- हम भी चाहें तो भेज सकते हैं.. लेकिन ये पाप है.. हम पाप नहीं करते

रिपोर्टर- अपना खून देते हो दूसरे को

मजदूर- मजबूरी है..

अजय वो नाम था जो इन लड़कों की जबान से बार-बार आ रहा था। इनके मुताबिक अजय 11 भाषाएं जानता है और उसका एक ही काम है रिसर्च के नाम पर इंसानी गिनी पिग तैयार कर लैबों में भेजना। तहकीकात के दौरान अब हमारे रडार पर आया अजय नाम का ये शख्स।

तहकीकात के दौरान हम जिस एजेंट से मिलने वाले उसे इस बात की कतई परवाह नहीं कि अगर खतरनाक दवाओं से कोई मारा जाए तो उसके परिवार का क्या होगा। खुद को हमने एक अमेरिकी दवा कंपनी का नुमाइंदा बताया और ज्यादा साइड इफेक्ट्स वाली दवाओं की टेस्टिंग के लिए आदमी मांगे। हमारे मुंह खोलने की देर थी कि अजय ने हर जरूरत पूरी करने का वादा कर डाला लेकिन वो पहले सौदे की शर्तें तय कर लेना चाहता था।

रिपोर्टर - अगर रिक्वायरमेंट होती है तो फिर उनको कंटीन्यू करते हैं.. 15 दिन आ सकता है.. 3-3, 3-3 का स्टेज..

अजय- तो लड़के जाएंगे, उनको क्या पेमेंट होगा

रिपोर्टर- उनका पेमेंट जैसे कल हमारी बात हुई थी, नॉर्मल 15-15.. जो 5-5-6 का.. हम उतने पर भी जा सकते हैं.. हम उससे ज्यादा भी जा सकते हैं.. इट ऑल डिपेंड्स ऑन यू, यू हैव टु डिसाइड कि हमें कितना पेमेंट करना है.. आप चाहें जिस वे में, लीगल पेमेंट चाहिए लीगल, इल्लीगल पेमेंट चाहिए इल्लीगल पेमेंट होगा.. सिंस दे डोंट जस्ट होल्ड एनी बैंक अकाउंट.. कैश पेमेंट होगा..

अजय- वो तो पेमेंट बैंक अकाउंट से कोई करता भी नहीं है क्योंकि ये काम जो करने वाले हैं उन लड़कों के पास तो घर भी नहीं है, अकाउंट तो बहुत दूर की बात है..

रिपोर्टर- यही चीज मैं पहले ही कह दिया..

अजय- वो जो स्टडी है फर्स्ट फेज, सैकेंड फेज, थर्ड फेज.. जो आम 6-5 चलता है, वो 4 से 5 पर जाता है, उसका पेमेंट चलता है मार्केट में.. और ये 3-7-7 हो गया.. आपका अगर फेज 2 का है, फेज 3 का है, सीधा आपने कर दिया है दैन वो फिर 15-18-20-22 ऐसे आएगा.. दूसरा आपको किस टाइप के वालंटियर होना मतलब वो पूरा इलीट भी आप ले सकते हैं या फिर इल्लिटरेट (अनपढ़) भी ले सकते हैं..

अजय- क्या नाम है कितने आदमी होना चाहिए, क्या पेमेंट आप देंगे

रिपोर्टर- टैबलेट का नाम और क्या पूछा आपने

अजय- एक्जेक्ट पेमेंट क्या देंगे आप उनको.. मेरे ऊपर डिपेंड नहीं करता ये.. आपको ये डिसाइड करना.. वहां पे बैठके कि आप उनको 3 दिन रखेंगे, 6 दिन रखेंगे, 9 दिन रखेंगे या 15 दिन रखेंगे.. उसके बाद उनका कितना ब्लड लेंगे एक्जेक्ट..उसके बाद में व्हाट यू पे दैम.. एक्जेक्ट अमाउंट..

अजय- जो भी है, जो आज हम यहां अपन डिस्कस करेंगे, वहां जाने के बाद वो बदलना नहीं है.. ये नहीं है वो ज्यादा नहीं होगा.. अभी हम कम दे रहे हैं..कम भी नहीं लेके आता कोई .. जो आप बोलेंगे इतने आदमी होना.. आपको आदमी बंदे आपको देना ये मेरा काम है.. कितने होना.. अगर सही काम के लिए होना तो भी हैं.. गलत काम के लिए होना तो भी हैं.. लेकिन पहले बता के..

शर्तें तय हो गईं तो हमने कुछ और कुरेदा.. तब इस गोरखधंधे के कुछ और खतरनाक सच सामने आए.. अगर ड्रग ट्रायल के दौरान कोई मारा जाता है, तो यही लोग मामले को रफा-दफा करते हैं..

रिपोर्टर- अच्छा एक बात बताओ यहां पे मैंने एक कंट्रोवर्सी सुनी.. कोई रिसर्च लैब था.. कुछ डेथ-वेथ हुई थी कुछ ऐसा क्या था..

अजय- पहले हुआ था, खत्म हो गया

रिपोर्टर- वैसा कोई टेंशन तो नहीं रहता

अजय- ऐसा कुछ नहीं है..काम के अंदर टेंशन रहेगा ही रहेगा.. आप अगर कंटीन्यू 10 साल से काम कर रहे हो तो टेंशन तो होना ही होना है..

रिपोर्टर- मान लीजिए ऐसा कोई एक्सीडेंट होता है..

अजय- अगर एक फैमिली को मैनेज करना कि हां भई वो यहां इस काम के लिए आया था.. वो प्रॉपर साइन किए हैं.. ये हो गया..

दलाल अच्छी तरह जानता है कि ट्रायल के दौरान अगर मौत हो गई तो क्या करना है। शातिर दवा कंपनियां अनपढ़ और मजबूर मजदूरों से एक डिक्लेरेशन पर साइन करवाती हैं और इसके बाद उस मजदूर की जिंदगी गिरवी रख जाती है।

इसकी तहकीकात के लिए हम पहुंचे चेन्नई जहां ट्रायल के लिए महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से 80 लोग लाए गए थे। ट्रायल के लिए आए एक शख्स ने खुलासा किया कि एक बार ट्रायल के लिए लैब में घुसने के बाद बाहर की दुनिया उनके लिए अनजानी होती है।

रेड्डी- ज़्यादातर लोग मज़बूरी और पैसे में ये करते हैं..अन्दर मोबाइल भी नहीं अलाउड होता है...जब तक अंदर रहो, बाहर से कोई कॉन्टेक्ट नहीं रहता..

फार्मा कंपनियों के लिए बेसहारा और अनपढ़ सबसे अच्छा मोहरा होते हैं क्योंकि उनकी जिंदगी-मौत की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। अगर वो किस्मत वाले हुए तो जिंदा बाहर आते हैं, नहीं तो उनकी लाश और मुश्किल ये कि इसका पता तक किसी को नहीं चलता।


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