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खुली साजिश, बच गईं जयललिता, रुक गया तख्तापलट!

Posted on Jan 30, 2012 at 09:03pm IST | Updated Jan 31, 2012 at 08:06am IST

नई दिल्ली। राजनीति में कोई दोस्त नहीं होता। इस बात का एहसास इस वक्त तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता से ज्यादा किसी और को नहीं हो सकता। वो हमारे-आपके बीच हैं...जिंदा हैं और अब सुरक्षित भी। लेकिन पिछले 6 महीने में जो कुछ हुआ उसमें अगर जयललिता छोटी सी भी चूक करतीं तो कहानी कुछ और हो सकती थी।

जी हां, डीएमके को सत्ता से बेदखल करने के तुरंत बाद से ही जयललिता के खिलाफ साजिश का चक्रव्यूह रच दिया गया। तहलका मैगजीन की मानें तो इस साजिश की सबसे बड़ी सूत्रधार थीं शशिकला। वो शशिकला जिसे दुनिया पिछले 25 साल से जयललिता की सबसे करीबी दोस्त के तौर पर जानती थीं।

खुली साजिश, बच गईं जयललिता, रुक गया तख्तापलट!

ये कहना गलत नहीं होगा की जयललिता की सियासी हो या फिर रोजमर्रा की जिंदगी, उसकी डोर भी शशिकला के हाथ में थी। इसी शशिकला के बेटे को जयललिता ने अपनाया और 1995 में उसकी शादी में 100 करोड़ रुपए से ज्यादा पानी की तरह बहा दिए।




सवाल है कि फिर अचानक क्या हुआ जो सब कुछ बदल गया। पिछले 25 साल से शशिकला अपने रिश्तेदारों की फौज के साथ जयललिता के घर में ही रहती थीं। कहने वाले कहते हैं कि इस दौरान जयललिता सत्ता में रहीं या विपक्ष में, उनका कोई फैसला शशिकला की मर्जी के बिना नहीं हुआ। पद की शपथ जयललिता लेती थीं लेकिन शासन पर पूरा नियंत्रण शशिकला का ही था। सवाल फिर वही, ऐसा क्या हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया।

17 दिसंबर, 2011 को जयललिता ने शशिकला को और उसके रिश्तेदारों को अपने घर से निकाल दिया। 40 से ज्यादा वो नौकर भी हटा दिए गए जो शशिकला 1989 में अपने साथ अपने गांव मन्नारगुडी से लेकर आई थीं। ये 25 साल की दोस्ती खत्म होने का आखिरी सबूत था क्योंकि जयललिता के घर में सारे नौकर, खाना बनाने वाले, ड्राइवर, सिक्योरिटी गार्ड, मैसेंजर सब शशिकला के गांव से ही आए थे। तहलका मैगजीन की मानें तो मन्नारगुडी से आए इन लोगों ने जयललिता के इर्दगिर्द एक ऐसा जाल डाल दिया कि वो हकीकत कभी समझ ही नहीं पाईं।

नेताओं को जयललिता से मिलना हो तो शशिकला से पूछो, अफसरों को जयललिता से मिलना हो तो शशिकला से पूछो, कारोबारियों को जयललिता से मिलना हो तो शशिकला से पूछो, शशिकला ने जयललिता की जिंदगी पर कब्जा कर लिया था और हैरानी ये कि जयललिता को इसकी भनक तक नहीं हुई।

भरोसे का कत्ल इसी को कहते हैं। जब जयललिता पिछले साल चुनाव में जबरदस्त कामयाबी के बाद मुख्यमंत्री के दफ्तर में पहुंची तो उन्हें एहसास नहीं था कि आसपास क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है। वो खुद आय से ज्यादा संपत्ति के मामलों में इतना परेशान थीं कि उन्होंने ध्यान देना भी जरूरी नहीं समझा और इस बीच उनकी कुर्सी को हमेशा के लिए खिसकाने की तैयारी कर ली गई।

सूत्रों की मानें तो इस वक्त मुश्किल में पड़ी एक मुख्यमंत्री की मदद एक मुख्यमंत्री ने की वो थे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। मोदी और जयललिता के बीच रिश्ते हमेशा से अच्छे रहे हैं। यही वजह है कि अपने शपथ ग्रहण समारोह में जयललिता ने नरेंद्र मोदी को खासतौर पर बुलाया था। तहलका मैगजीन के मुताबिक मुख्यमंत्री का पद संभालने के कुछ ही महीनों बाद जयललिता को नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले आगाह किया। उनसे कहा कि अपने इर्दगिर्द रहने वाले लोगों और खासकर शशिकला की हरकतों पर ध्यान दें।

तमिलनाडु में शशिकला और उसके रिश्तेदारों की टोली को मन्नारगुडी माफिया कहा जाता है और मोदी ने उन्हें इस माफिया से बचकर रहने को कहा। जयललिता के लिए ये एक चौंकाने वाला खुलासा था। जिस दोस्त पर वो आंख मूंद कर भरोसा करती हैं उससे किस तरह का खतरा। ये सवाल जयललिता को लगातार मथ रहा था और इसका जवाब भी उन्हें नरेंद्र मोदी से ही मिला।

तमाम विवादों से अलग नरेंद्र मोदी को करीब से जानने वाले जानते हैं कि वो दोस्ती और दुश्मनी कितनी अच्छी तरह निभाते हैं। दरअसल गुजरात में उन्हें एक अरबपति एनआरआई ने बताया कि तमिलनाडु में एक प्रोजेक्ट के लिए मन्नारगुडी माफिया ने पूरे प्रोजेक्ट की कीमत का 15 फीसदी रिश्वत के तौर पर मांगा। मन्नारगुडी माफिया कोई और नहीं शशिकला और उसके रिश्तेदार ही थे। ये बात नरेंद्र मोदी ने तुरंत जयललिता को बता दी।

मोदी से बात होने के बाद जयललिता ने पहली बार शशिकला की हरकतों पर गौर करना शुरू किया। इसी दौरान चेन्नई मोनोरेल प्रोजेक्ट का मामला उनके सामने आया। जयललिता चाहती थीं कि चेन्नई में मोनोरेल प्रोजेक्ट पर जल्द से जल्द काम किया जाए। वो सिंगापुर की एक बड़ी कंपनी को इस प्रोजेक्ट का ठेका देने के भी पक्ष में थीं। लेकिन जब कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद फाइल जयललिता के पास पहुंची तो वो चौंक गईं।

सरकार की तरफ से मलेशिया की दूसरी कंपनी को ठेका देने की तैयारी कर ली गई थी। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। जयललिता ने तत्काल मुख्य सचिव देबेंद्रनाथ सारंगी को बुलवा लिया। सवाल-जवाब के दौर के बीच जयललिता को दूसरा झटका लगा। सारंगी ने उन्हें बताया कि दरअसल जयललिता के लिखित आदेश के बाद ही उन्होंने मलेशिया की कंपनी को ठेका देने का फैसला किया। सवाल फिर उछला-आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। इसके बाद मुख्यमंत्री ने इस केस की सारी फाइलें अपने पास मंगवा लीं देखा कि एक फाइल पर मलेशिया की कंपनी को ठेका देने की बात लिखी है। जयललिता के दस्तखत भी हैं। अब शक की सूई घूमी शशिकला की ओर।

ये रिश्तों में तल्खी की शुरुआत थी। जयललिता ने शशिकला को बुलाकर पूछा कि फाइल पर फर्जी साइन किसने किए। शशिकला ने इससे साफ इनकार कर दिया लेकिन इस वाकये ने जयललिता के मन में एक ऐसी गांठ बना दी जिसका खुलना नामुमकिन था। शशिकला पर जयललिता का शक बढ़ता ही गया।

ये वो दौर था जब चेहरे से हमेशा बेहद आत्मविश्वास में रहने वाली जयललिता का खुद पर भी भरोसा हिल गया। राज्य की मुख्यमंत्री होने के बावजूद सरकार में फैसले कोई और ले रहा था। मुश्किल ये कि अफसर भी उसका साथ दे रहे थे। बिना अफसरों की मिलीभगत के इतनी अहम फाइल पर मुख्यमंत्री के फर्जी साइन कोई नहीं कर सकता।

तभी जयललिता को एक और खुफिया जानकारी मिली और इस जानकारी ने उनके होश फाख्ता कर दिए। सालों से जयललिता कुछ दवाइयां लगातार ले रही थीं। घर में जो नर्स थी उसे भी शशिकला ने ही नौकरी दी थी। अचानक एक दिन जयललिता बिना शशिकला को कुछ बताए शहर के एक नामी डॉक्टर से मिलने चली गईं। साथ में वो दवाइयां भी थीं जो जयललिता को दी जा रही थीं। इस डॉक्टर ने जयललिता और उन्हें दी जा रही दवाइयों की जांच की।

तहलका के मुताबिक जयललिता को नशे की दवा दी जा रही थी और सबसे बड़ी बात कि उन दवाओं में हल्का जहर था। यानी...मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने के लिए जयललिता को जहर दिया जा रहा था। मैगजीन की मानें तो जयललिता को जहर देकर मारने की तैयारी कर ली गई थी।

इस वक्त जयललिता की स्थिति का अंदाजा लगाइए। राज्य की सबसे ताकतवर महिला लेकिन अपनी ही हत्या की साजिश से अनजान। घर में ही, घर के ही लोग उन्हें रास्ते से हटा देना चाहते थे। यकीनन हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। जयललिता को समझ आ गया कि अब जो कुछ भी करना है बहुत जल्द करना है।

सरकार अपनी लेकिन ना नेता अपने और ना ही अफसर। अजीब हालात से गुजर रही थीं जयललिता। इसी दौरान उनका पुलिस के बड़े अफसरों से भी भरोसा उठने लगा। दरअसल मुख्यमंत्री बनने के बाद ये तो तय था कि जयललिता डीएमके के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ेंगी। लेकिन उन्होंने एंटी करप्शन विभाग के अफसरों को ये भी ताकीद की थी कि करुणानिधि के परिवार को बिना ठोस सबूत ना छेड़ा जाए।

हुआ इसका उल्टा। मुख्यमंत्री की बात को नकारते हुए तमिलनाडु पुलिस ने डीएम के दूसरे नेताओं के अलावा करुणानिधि के बेटे स्टालिन के खिलाफ भी केस दर्ज कर लिया। जयललिता ने तुरंत खुफिया विभाग के आईजी से इस बारे में पूछा तो जवाब मिला शशिकला से पूछकर ही ये केस दर्ज किया गया है। अब जयललिता को ऐहसास हुआ कि शशिकला उन्हें रास्ते से हटाने के लिए डीएमके के साथ भी खेल रही हैं।

करुणानिधि के उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जा रहे स्टालिन के खिलाफ केस का फायदा उनके भाई अझागिरी को होता। इसलिए अब जयललिता के सामने सवाल था कि क्या शशिकला उनके तख्तापलट के लिए डीएमके के एक धड़े से जा मिली हैं। इस सवाल का जवाब भी उन्हें जल्द ही मिल गया।

जयललिता के खिलाफ साजिश के तार अब बैंगलोर से जुड़ रहे थे। तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक को कर्नाटक के डीजीपी ने एक सनसनीखेज जानकारी दी। सूत्रों की मानें तो दिसंबर के पहले हफ्ते में बैंगलोर में शशिकला और उनके रिश्तेदारों ने मिलकर एक खुफिया बैठक की। इस बैठक में आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में जयललिता की मुश्किल पर बात हुई। जयललिता को हटाने के बाद मुख्यमंत्री कौन होगा इस पर भी चर्चा की गई।

लेकिन शशिकला और उसके रिश्तेदारों को अंदाजा नहीं था कि उनकी एक एक बात कर्नाटक पुलिस सुन रही है। जिस कमरे में ये बैठक हो रही थी वहां कर्नाटक पुलिस ने माइक्रोफोन लगा दिए थे। कर्नाटक पुलिस ने बैठक में हुई पूरी बातचीत का टेप बनवाकर तमिलनाडु पुलिस को भेज दिया। कुछ ही घंटों बाद मुख्यमंत्री जयललिता के सामने ये टेप रखे हुए थे। उन्होंने एक-एक बात गौर से सुनी और फिर हमेशा मुस्कराती दिखने वाली जयललिता के चेहरे पर सख्ती आ गई।

बीजेपी के एक मुख्यमंत्री और बीजेपी की एक सरकार ने मिलकर जयललिता को तख्तापलट से बचा लिया। वर्ना शशिकला की कमान में मुन्नारगुडी माफिया ने तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होने की पूरी तैयारी कर ली थी। दिसंबर के दूसरे हफ्ते तक जयललिता तय कर चुकी थीं कि उन्हें अब आगे क्या करना है। जयललिता ने अपने भरोसेमंद राज्य के पुलिस महानिदेशक के रामानुजम को बुलाया। मकसद था शशिकला के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाना। तहलका की मानें तो इसके बाद अगले 5 दिनों तक शशिकला और उसके रिश्तेदारों की एक-एक हरकत पर नजर रखी गई। पुलिस पर भरोसा कम था इसलिए एक प्राइवेट जासूसी एजेंसी की मदद भी ली गई। शशिकला, उसके रिश्तेदारों और सारे सहयोगियों के फोन टैप करने शुरू हुए और हर दिन की रिपोर्ट जयललिता के पास भेजी जाने लगी।

अंदाजा लगाइए एक मुख्यमंत्री को किसी के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए निजी जासूसी एजेंसी की मदद लेनी पड़ी। लेकिन पिछले साल दिसंबर में तमिलनाडु में ये भी हुआ। हालांकि जयललिता को जो रिपोर्ट मिली उसने उनकी चिंता और बढ़ा दी।

शशिकला के तार तमिलनाडु के सत्ता के गलियारे और प्रशासनिक अमले हर जगह फैले हुए थे। वो एक झटके में सभी को नहीं हटा सकती थीं क्योंकि मुकाबला करने लायक सियासी ताकत जयललिता के पास बची नहीं थी। उन्होंने शुरुआत की अफसरों से। जयललिता ने सबसे पहले खुफिया विभाग में अपने भरोसेमंद अफसरों की तैनाती करनी शुरू की। उन्होंने खुफिया विभाग के आईजी का तबादला कर दिया। पिछले 10 साल से जयललिता की सुरक्षा में लगे पर्सनल सिक्योरिटी अफसर को भी हटा दिया गया। इसके बाद कैबिनेट बुलाकर जयललिता ने ऐलान कर दिया कि अब सरकार में आखिरी फैसला उनका ही होगा। मंत्रियों को ताकीद की गई कि वो शशिकला के किसी भी आदेश को नहीं मानें।

जयललिता के ये तेवर देखकर शशिकला सकते में थी। सूत्रों की मानें को शशिकला ने जयललिता को सफाई देने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं मानीं। 17 दिसंबर को शशिकला को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा झटका लगा। चेन्नई के जिस घर में शशिकला जयललिता के साथ पिछले 25 साल से रह रही थीं उन्हें वहां से बाहर निकाल दिया गया। शशिकला के सारे रिश्तेदार, सारे कर्मचारी, सब बाहर। अपना घर सुरक्षित करने के बाद जयललिता ने अब खुद को मिले धोखे की सजा देने की तैयारी की।

--पुलिस और कानूनी जानकारों को शशिकला के अकाउंट खंगालने के लिए कहा गया।

--शशिकला के करीबी रिश्तेदार रावनन को सिंगापुर से लौटते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया।

--रावनन के घर पर छापेमारी में पुलिस को 50 करोड़ रुपए नकद मिले।

जयललिता को धीरे-धीरे पता चल रहा था कि मन्नारगुडी माफिया ने उनका नाम लेकर कैसे अरबों रुपए कमाए हैं। आरोप है कि शशिकला और उसके रिश्तेदारों ने इस दौरान 5000 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया था। यही नहीं विधानसभा चुनाव के टिकट बांटने में भी शशिकला ने 300 करोड़ रुपए कमाए। कहा ये भी जाता है कि जयललिता की सत्ता में वापसी के कुछ महीने के भीतर ही मन्नारगुडी माफिया ने 1000 करोड़ रुपए कमा लिए थे।

जयललिता अपनी हमराज रहीं शशिकला पर लगे आरोप देख रही थीं और सबूत भी। 17 दिसंबर को शशिकला को घर से निकालने के अगले ही दिन 18 दिसंबर को जयललिता ने अपने तमाम मंत्रियों के 38 पर्सनल सिक्योरिटी अफसरों का भी तबादला कर दिया। कहा जाता है कि शशिकला इन पर्सनल सिक्योरिटी अफसरों के जरिए ही पूरी सरकार के एक एक फैसले पर नजर रखती थीं। मन्नारगुडी माफिया से नजदीकी के चलते इन्हें मंत्रियों से भी ज्यादा ताकतवर माना जाता था। लेकिन अब जयललिता ने ये संपर्क भी काट दिया। अब जयललिता के रडार पर वो मंत्री आए जो शशिकला के करीबी माने जाते थे।

सूत्रों की मानें तो दिसंबर के तीसरे हफ्ते में जयललिता ने पीडब्ल्यूडी मंत्री के वी रामालिंगम को बुलाया। जैसे ही रामालिंगम कमरे में दाखिल हुए जयललिता ने उनसे कहा-भविष्य के मुख्यमंत्री का स्वागत है। ये सुनते ही रामालिंगम सन्न रह गए...आखिर ये क्या हुआ। माना जाता है कि शशिकला ने मंत्री रामालिंगम को जयललिता के खिलाफ तंत्र पूजा करने में भी लगा दिया था। मकसद ये कि तंत्र-मंत्र के सहारे वो जयललिता को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं। सूत्रों की मानें तो जयललिता ने शशिकला के करीबी 13 मंत्रियों की लिस्ट तैयार कर ली है। इन मंत्रियों पर किसी भी वक्त गाज गिर सकती है। जयललिता की तैयारी तमाम प्रशासनिक विभागों के मुखियाओं को बदलने की भी है।

सस्पेंस...ड्रामा...अफसरों-नेताओं की मिलीभगत...और मकसद एक मुख्यमंत्री का तख्तापलट...मकसद एक मुख्यमंत्री को हमेशा के लिए रास्ते से हटाना। ये कहानी फिल्मी भले लगती है लेकिन हकीकत भी यही है। जयललिता अब एक-एक करके पूरे प्रशासन से शशिकला के करीबियों को हटा रही हैं। उन्हें ये भी ऐहसास हो गया है कि राजनीति और जिंदगी में भरोसा और दोस्ती आंख मूंदकर नहीं की जाती।


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