(63वें गणतंत्र दिवस के मौके पर नेटवर्क 18 द्वारा आयोजित ब्लॉग लेखन प्रतियोगिता में निखिल आनंद गिरी का ये ब्लॉग सर्वश्रेष्ठ चुना गया। ब्लॉग 500 शब्दों में ‘भारत का गणतंत्र दिवस 1950 बनाम 2012’ विषय पर लिखा जाना था।)
निखिल आनंद गिरि
वही दिल्ली की सर्दी और वही गणतंत्र दिवस की परेड, झांकियां और दूरदर्शन या आकाशवाणी पर सीधा प्रसारण...मेरा 22 कैरेट देशभक्त मन भी बोर होकर कुछ अलग सोचने लगा...सरकारें पांच सालों के लिए आती हैं (हालांकि ऐसा होना भी दुर्लभ ही है)....वही मंत्री, वही संतरी, वही परेड....बोर तो हो ही जाते होंगे पांचवां साल आते-आते....मुझे लगता है कि मुश्किल से मिली छुट्टी में टेलीविजन पर अपना कीमती समय ऐसे खर्च नहीं किया जा सकता....कुछ तो बदले भाई...।

"राष्ट्रपति भवन के दूर के छोर से मैं देख सकता हूं कि भोपाल गैस त्रासदी के शिकार चले आ रहे हैं...अद्भुत क्षण है...टेढ़ी-मेढ़ी शारीरिक संरचना, खून की बीमारियों और मानसिक रोगों से ग्रस्त असंख्य लोग... चूंकि, गणतंत्र का सबसे ख़ास अनुभव इन्होंने बटोरा है, तो पहली झांकी इनकी...आगे और भी मनोरम झांकियां हैं, जो आपका दिल गर्व से भर देंगी...वाह! क्या बात है..."
कैमरा अब कॉरपोरेट मसीहाओं की और घूमता है, फिर ज़रा-सा पैन करता है उन कुर्सियों की तरफ जो स्वास्थ्य मंत्रालय और मध्य प्रदेश सरकार के लिए आरक्षित हैं....
कमेंटरी चालू है-
"मैं देख पा रहा हूं कि लंबे सफेद लिबासों में पूरी तरह से नग्न अवस्था में कुछ महिलाएं चली आ रही हैं...वो आर्म्ड फोर्स एक्ट में संशोधन या समाप्ति जैसे नारे भी लगा रही हैं.....मणिपुर की यह झांकी ऐतिहासिक भी है और मनोरम भी...वाह! क्या बात है..."
कैमरा मुड़ता है सेना प्रमुख की तरफ, रक्षा मंत्री की तरफ और मुस्कान बिखेरते नॉर्थ ईस्ट के अधिकारियों की तरफ...परेड जारी है और कमेंटरी भी....
"अगली झांकी कुछ मैले-कुचैले लोगों की हैं...मैं अनुमान से कह सकता हूं कि ये केरल के एक गांव के किसान हैं, जो अपने गांव में कोका कोला का प्लांट लगाये जाने का विरोध कर रहे हैं...उनके हाथ में कुछ बैनर तो हैं, मगर दिल्ली के अफ़सरों की कुछ समझ में नहीं आ रहा...क्षमा करें, मुझे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा...वो इस बार भी चुपचाप दिल्ली के राजपथ से गुजर जाएंगे, यूं ही..."
अब हल्की-हल्की धूप बढ़ने लगी है....कैमरा पर्यावरण मंत्री की ओर घूमता है, जो कोका कोला पीकर गला तर कर रहे हैं...बीच-बीच में उठ-उठ कर किसानों को हाथ उठाकर अंगूठा भी दिखा रहे हैं...।
"और अब अगली झांकी गुजरात से...गोधरा और आसपास के इलाकों से हुजूम शामिल है...और इन खूबसूरत घावों को देखिए, जो कभी नहीं भरने वाले...(कैमरा घावों के थोड़ा और नज़दीक जाता है)...ये दृश्य कभी नहीं भूले जा सकते...घाव अंदर से रिस रहे हैं...राजपथ लाल हो गया है...सब प्रधानमंत्री को सलामी देते आगे बढ़ते हैं...."
कैमरा अब भीड़ की तरफ घूम गया है, जो पूरी झांकी का आनंद ले रही है...गुज़रात के मुख्यमंत्री कुछ उद्योगपतियों के कान में फुसफुसा रहे हैं...उद्योगपति मुस्कुरा रहे हैं...सब खुश हैं...ये खूबसूरत नज़ारा कभी-कभी ही नसीब होता है...वाह! क्या बात है..."
कमेंटरी जारी है-
"देवियो और सज्जनो, यह असली भारत की असली झांकी है...अद्भुत, अविश्वसनीय! झांकी में आगे कुछ खनिज मजदूर हैं, अल्पसंख्यक भी और ओड़िशा या झारखंड के आदिवासी हैं...ओड़िशा त्याग और सहनशीलता का राज्य रहा है...इस राज्य ने हमेशा अपनी ज़मीन लुटाई है और खुद को गौरवान्वित महसूस किया है...ये भी बताते चलें कि हालिया सर्वेक्षण में सबसे "लुटे-पिटे" राज्यों की सूची में यही राज्य अव्वल आया है...हम ओड़िशा को उसकी इस उपलब्धि के लिए सलाम करते हैं...।
कैमरा अब रॉबर्ट वढेरा की तरफ पैन करता है, जो एक बुलेटप्रूफ़ कैबिनेट में बैठे हैं और लोगों को हाथ दिखा रहे हैं...मुझे लगता है वो कुछ चेहरों को पहचान गए हैं...उनके अंगरक्षक भी बंदूक ताने हैं और मुस्कुरा रहे हैं...
"और अब मैं...मैं क्या...हे भगवान...पूरी दर्शक दीर्घा स्तब्ध है....राजपथ की सड़कों पर मुंबई की एक लोकल ट्रेन आती दिख रही है...इस ट्रेन की रफ़्तार बहुत कम है...मैं देख रहा हूं कि 1500 लोगों की क्षमता वाली इस ट्रेन में 7000 लोग हैं...हर दरवाज़े से लोगों की टांगें बाहर दिख रही हैं...कुछ लोग इसकी छत पर भी चढ़ गए हैं...खिड़कियों से झोले और बैग लटके हुए हैं...विकलांगों का डिब्बा भी खचाखच भरा है...।
इस झांकी को देखकर विदेश से आए कुछ मेहमान दर्शक अचंभे में हैं....वो तालियां पीट रहे हैं....और अब झांकी एक हैरतअंगेज क्लाइमेक्स की तरफ बढ़ रही है...ट्रेन की रफ़्तार बढ़ी है...कुछ लोग ट्रेन से बाहर गिर गए हैं...पूरा देश तालियां बजा रहा है...वाह!! क्या बात है...सचमुच भारत जादूगरी का देश है....मुझे अरविंद अडिग की याद आ रही है...उनकी किताब के कुछ पन्नों से यह दृश्य मिलता है...मुझे आशा है कि आप अरविंद अडिग को जानते हैं, जिन्होंने हाल ही में बुकर जीता है..."
अब देखिए, क्या कमाल है साहब। पांच सौ और हजार के नोटों की गड्डियों में गांधी मंकी कैप पहनकर बैठे हुए हैं। धुंध बहुत है, मगर सब कुछ साफ-साफ दिख रहा है। चार पुतले हैं। एक के पीछे राजा लिखा है, एक के पीछे कलमाडी। काले चेहरे पर दिव्य काली मुस्कान है। दो महिलाएं हैं, जिनके विशेष अंगों पर नोट टंगे हैं। उनके हाथ में कटोरियां हैं। कटोरियों में घास है। वाह..वो घास खा रही हैं। देखिए, क्या महान दृश्य है।
हम इसके आगे का प्रसारण नहीं कर सकते। सरकारी चैनल पर प्रसारण की इतनी ही आज़ादी है। इसके बाद का प्रसारण अश्लील समझा जाएगा। प्रसारण पर पाबंदी लगा दी जाएगी। आप तो समझदार जनता हैं, सब समझते हैं। ऐसे जीने की आदत है आपको। तो फिर जीते रहिए और हमें भी दाल-रोटी खाने दीजिए।
आशा है कल से फिर आपकी ज़िंदगी रफ़्तार पकड़ लेगी....आप हर रोज़ की तरह मेट्रो से लेकर मॉल्स तक कदमताल करने लगेंगे...."
जय हिंद......जय हो....!
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