इस्लामाबाद। अदालत की अवमानना के मामले में फंसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी की कुर्सी खतरे में है। पाक सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 13 फरवरी को तलब किया है ताकि उनके खिलाफ आरोप तय हो सकें। पीपीपी सरकार कानूनी विकल्पों को तौल रही है। इसी के साथ गिलानी के विकल्प पर भी चर्चा तेज हो गई है।
गुरुवार को हुई सुनवाई के बाद 7 जजों की बेंच ने आदेश दिया कि मुल्क के वज़ीरे आजम 13 तारीख को अदालत के सामने पेश हों ताकि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना के मामले में आरोप तय हो सके। गिलानी पर आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए स्विस अधिकारियों से आग्रह ना करके अदालत की अवमानना की है। वहीं गिलानी की दलील है कि संविधान के तहत जरदारी को संरक्षण हासिल है, इसीलिए सरकार ने इस बाबत कोई कदम नहीं उठाया।

राष्ट्रपति को कानूनी संरक्षण वाली बात अदालत के गले नहीं उतर रही है। अगर अदालत गिलानी को दोषी करार देती है तो उनकी कुर्सी जा सकती है। यही नहीं, पांच सालों तक कोई सरकारी पद संभालने पर भी रोक लग सकती है। इसमें 6 महीने तक जेल का प्रावधान भी है। ऐसे में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी सरकार अब कानूनी विकल्प तलाश रही है। तैयारी अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने की भी है।
नवाज शरीफ के बाद गिलानी पाकिस्तान के दूसरे प्रधानमंत्री हैं जिनके खिलाफ अदालत की अवमानना का नोटिस जारी हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 16 जनवरी को कई नेताओं को मिली आम माफी के मामले में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को ये नोटिस जारी किया था। 19 जनवरी को गिलानी तमाम तामझाम के साथ खुद गाड़ी ड्राइव करके कोर्ट में पेश हुए थे।
मामले की जड़ में है एनआरओ, मुशर्रफ शासनकाल में जारी वो अध्यादेश जिसके तहत साल 2008 में सैकड़ों नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले बंद कर दिए गए थे। इसके बाद ही बेनजीर भुट्टो की मुल्क वापसी हुई थी। लेकिन 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को बंद करने के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। बहरहाल सेना और सुप्रीम कोर्ट के साथ पहले से ही टकराव की स्थिति में फंसी पीपीपी सरकार पर अब खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।
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