नई दिल्ली। शादी एक ऐसा खूबसूरत और पवित्र सिस्टम है जिसमें दो अंजान इंसान पलों में बंध जाते हैं एक अटूट बंधन में। सात फेरों के साथ वो हो जाते हैं पति-पत्नी। वो बन जाते हैं जिंदगी भर के सुख-दुख के साथी। यानी पति-पत्नी की बराबर की जिम्मेदारी। लेकिन फिर भी है पत्नी का दोयम दर्जा। इसलिए मांग उठने लगी है पत्नी का क्यों न हो पति की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी।
दरअसल योजना आयोग से जुड़ी एक कमेटी ने ऐसा कानून बनाने की सिफारिश की है जिससे परिवार की संपत्ति में पति-पत्नी को बराबर का हिस्सेदार माना जाए। तलाक होने पर सारी संपत्ति दोनों के बीच बराबर-बराबर बांट दी जाए। संपत्ति चाहे किसी ने भी खरीदी हो। समिति ने ये भी कहा है कि ये कानून सभी समुदायों पर लागू हो और इसके तहत लिव इन रिलेशन को भी रखा जाए।

योजना आयोग के एक पैनल ने महिला अधिकारों को लेकर एक बड़ी और क्रांतिकारी पहल की है। महिला सशक्तीकरण पर काम कर रहे आयोग के इस उच्चस्तरीय पैनल ने सुझाव दिया है कि किसी दंपति की सारी चल-अलचल संपत्ति में पुरुष और महिला, दोनों का मालिकाना हो। फिर चाहे संपत्ति की खरीद किसी ने भी की हो। पैनल ने फैमली लॉ की रूपरेखा में बदलाव की सिफारिश करते हुए राइट टू मैरिटल प्रॉपर्टी एक्ट बनाने का सुझाव दिया है। इसके तहत तलाक होने पर पति और पत्नी के बीच सारी संपत्ति बराबर-बराबर बांटी जाएगी। इस बात से फर्क नहीं पड़ेगा कि कोई संपत्ति पति ने खरीदी है या पत्नी ने। ये कानून बिना भेदभाव के सभी समुदायों पर लागू हो। लिव इन रिलेशन में रहने वालों पर भी ये कानून लागू हो।
गौरतलब है कि इस मुद्दे पर कई सालों से चर्चा चल रही है। तलाक के बाद संपत्ति में महिला का अधिकार बड़ा सवाल बना हुआ है। अक्सर ऐसा देखने में आया है कि तलाक के बाद पत्नी अपने मां-बाप की दया पर निर्भर हो जाती है। उसके पास अपना कुछ भी नहीं होता। पिता की संपत्ति में भी उसे ज्यादा कुछ नसीब नहीं होता। इसलिए पैनल ने पति-पत्नी की संपत्ति को ज्वाइंट प्रॉपर्टी बनाने का सुझाव दिया है। हालांकि कानूनी जानकारों का मानना है कि पैनल के सुझाव कागजी हैं और इनमें कई बुनियादी मुश्किलें हैं। सबसे बड़ी मुश्किल लिव इन रिलेशनशिप में रहने वालों को इस कानून के तहत लाने से खड़ी होगी।
बहरहाल इसमें शक नहीं कि इन सुझावों ने महिलाओं से जुड़ी एक बड़ी समस्या पर ध्यान खींचा है। महिला अधिकारों से जुड़े लोगों का मानना है कि इन सुझावों से इस मुद्दे पर नई बहस खड़ी होगी जो किसी नतीजे तक पहुंचेगी। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने के दिशा में ये सुझाव काफी असरदार साबित हो सकते हैं। लेकिन इन सुझावों को कानून की शक्ल देना एक कड़ी चुनौती है। जानकारों के मुताबिक इन सुझावों में कई कमियां हैं जिन्हें दूर करने के लिए गंभीर बहस की जरूरत है। जानकारों का ये भी कहना है इन सुझावों को मानने से पहले सभी समुदायों से सलाह-मशविरा जरूर कर लेना चाहिए।
जानकार इसे क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं। शादी होते ही पति और पत्नी की संपत्ति ज्वाइंट हो जाएगी। एक-दूसरे की इजाजत या सहमति के बगैर दोनों में से कोई भी प्रॉपर्टी को बेचने जैसा फैसला अकेले नहीं कर पाएगा। इसके लिए दूसरे की सहमति जरूरी होगी। उनके मुताबिक इससे महिलाओं की इज्जत बढ़ेगी, ताकत बढ़ेगी, शादीशुदा महिला के मन में एक अंजाना-सा डर रहता है वो इस कानून के आने से हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। जानकारों के मुताबिक ये महिलाओं की बुनियादी जरूरत है जिससे उनका सशक्तिकरण और ज्यादा होगा।
शादीशुदा महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने की आयोग के पैनल की मंशा अच्छी है लेकिन इसमें कई कमियां हैं। इसमें कई दिक्कतें और अड़चन हैं।
पहली दिक्कत- (लिव इन रिलेशन को शामिल करना)
पैनल के सुझाव के मुताबिक पति-पत्नी के साथ-साथ लिव इन रिलेशन में रहने वाले पुरुष और महिला को भी इस प्रस्तावित कानून के दायरे में लाना चाहिए। जानकारों के मुताबिक पति-पत्नी को कानूनी दर्जा मिला होता है। समाज इसी रिश्ते को मानता है जबकि लिव इन रिलेशन में ऐसा कुछ नहीं होता। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दो वयस्कों के इस रिश्ते को जायज माना है लेकिन कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद समाज इसे अनैतिक मानता है। जानकार सवाल उठाते हैं क्या लिव-इन-रिलेशन में रह रहे लड़के या लड़की के जहन में वही विश्वास, वही भरोसा, वही प्यार और जिम्मेदारी का एहसास होता है जैसा कि एक पति-पत्नी के बीच होता है। समाज इसे संदेह की नजर से देखता है।
दूसरी दिक्कत- (सभी समुदायों को शामिल करने का सुझाव)
हर समुदाय और धर्म के अपने-अपने नियम और कायदे हैं। भारत में मुस्लिम समाज में मुस्लिम पर्सनल लॉ है, इसके अलावा हिंदू मैरिज एक्ट है। पुरुष और महिलाओं में प्रॉपर्टी के बंटवारे संबंधित सबके अपने-अपने नियम हैं। क्या अलग-अलग समुदाय इस प्रस्तावित कानून को स्वीकार करेंगे। इन दिक्कतों को देखते हुए एक दंपति समान संपत्ति के सुझाव को कानून का अमली जामा पहनाना आसान नहीं होगा।
यही नहीं, पति-पत्नी में ज्वाइंट प्रॉपर्टी के प्रस्तावित सुझाव में जानकार और भी कई मुश्किलें देखते हैं। क्या पूर्वजों से मिली संपत्ति का भी पति-पत्नी में बंटवारा होना चाहिए? क्या विरासत से मिली जायदाद, या गिफ्ट में मिली संपत्ति, या किसी तीसरे शख्स से मिली संपत्ति पर भी पति-पत्नी का बराबर का हक होना चाहिए? जानकारों के मुताबिक सिर्फ उसी संपत्ति को पति-पत्नी के बीच ज्वाइंट प्रॉपर्टी बनानी चाहिए जिसे उन्होंने अपनी कमाई से अर्जित की है।
जानकार योजना आयोग के पैनल के सुझाव में एक दूसरी मुश्किल भी देखते हैं। जानकारों के मुताबिक भारत में पुरुष प्रधान समाज है। यहां परिवार में पति-पत्नी के बीच सलाह मशविरा तो होता है लेकिन आखिरी फैसला पति ही लेता है। पुरुष में एक अनकहा अहम कहीं न कहीं छुपा होता है। ऐसे में क्या लड़का शादी के वक्त लड़की को अपने जायदाद में बराबर का हिस्सेदार बनाएगा? क्या वो ऐसी लड़की से शादी करेगा जो शादी के वक्त ही दोनों के कमाए जायदाद में सम्मलित हक की मांग करे? और अगर भविष्य में किसी वजह से दोनों अलग होते हैं तो क्या पति अपनी मेहनत से कमाई संपत्ति का आधा हिस्सा अपनी पत्नी को सौंप देगा? क्या इस प्रस्तावित सुझाव से भारतीय समाज का संतुलन नहीं बिगड़ेगा?
जानकार ये भी आशंका जाहिर कर रहे हैं इस सुझाव के लागू होने से कुछ लोग गलत फायदा भी उठाने की कोशिश करेंगे। हो सकता है साजिश के तहत कुछ लोग सिर्फ इस मंशा से शादी करें कि शादी के बाद तलाक लेकर वो लड़के या लड़की के जायदाद के आधे हिस्से के मालिक बन जाएंगे। ऐसी आपराधिक साजिशों से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए इन सुझावों को मानने से पहले गहरे मंथन और रिसर्ज की जरूरत है।
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