मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है। बालिग बेटी या बेटा तभी तक अपने मां-बाप के घर में रह सकता है जब तक उनके मां-बाप चाहें। कोर्ट के मुताबिक ये मां-बाप की इच्छा पर निर्भर करता है कि वो अपनी बालिग औलाद को घर में रखें या नहीं। यानी मां-बाप की सहमति के बगैर बालिग औलाद उनके घर में नहीं रह सकती। कोर्ट ने ये भी कहा कि बेटी की शादी के बाद पिता का घर उसके लिए गेस्ट हाउस की तरह हो जाता है।
अगर मां-बाप चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी जो अब बालिग हो चुके हैं उनके घर में उनके साथ नहीं रहें तो फिर उनके बच्चों को उनके घर से जाना होगा। वो जबरदस्ती अपने मां-बाप के साथ नहीं रह सकते। बॉम्बे हाईकोर्ट का मानना है कि बालिग होने के बाद मां-बाप के निजी मकान में रहने के लिए बच्चों को उनकी सहमति जरूरी है। कोर्ट के मुताबिक अगर संतान नाबालिग है तो ये मां-बाप की जिम्मेदारी बनती है कि वो उनकी देखभाल करे। लेकिन बच्चों के बालिग होने के बाद उऩ्हें ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं है जिससे कि वो अपने मां-बाप के निजी प्रॉपर्टी में रहें।

दरअसल में कोर्ट के सामने एक ऐसा मामला सामने आया था जिसमें एक बेटी और पिता के बीच एक फ्लैट को लेकर विवाद चल रहा था। 73 साल का पिता नहीं चाहता था कि उसकी 35 साल की शादीशुदा बेटी उनके फ्लैट में रहे। इस मामले में अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पिता की सहमति के बिना कोई भी बालिग संतान जबरदस्ती उनके घर में नहीं रह सकती।
विवाद पिता बहादुरजी बाटीवाला और उनकी बेटी कश्मीरा रॉबर्ट लोबो के बीच चल रहा था। बाटीवाला दादर की मशहूर पारसी कॉलोनी में रहते हैं। अपने इस घर में उन्होंने अपनी शादीशुदा बेटी कश्मीरा लोबो को रहने से मना कर दिया। कश्मीरा ने अपने पिता के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ये फ्लैट पारसी सेंट्रल एसोसिएशन कॉपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड का है। इसमें बाटीवाला की मां यानी बेटी की दादी मूल किराएदार थीं। 1980 में उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के बाद किराएदारी उनके बेटे बाटीवाला के नाम ट्रांसफर हो गई। 1998 में बाटीवाली की बेटी काश्मीरा की शादी हो गई और वो अपने पति के साथ रहने लगी। पिछले साल बाटीवाला ने सिविल कोर्ट में एक याचिका दायर कि जिसमें उन्होंने कोर्ट से गुजारिश की उनकी बेटी और दामाद को पारसी कॉलोनी के उस फ्लैट में दाखिल या रहने नहीं दिया जाए। इस याचिका में उन्होंने कहा कि उनकी बेटी और दामाद उनके घर के मामले में दखलअंदाजी कर रहे हैं और उन्हें घर मे आने ना दिया जाए।
इसके खिलाफ बेटी ने भी कोर्ट मे याचिका दायर की। जिसमें उसने कहा कि उसकी दादी के गुजरने के बाद किराएदार के तौर पर रहने का अधिकार पोती को भी होता है। और चूंकि ये मामला किराए के मकान से जुडा़ हुआ है इसलिए उसकी सुनवाई लघुवाद न्यायलय के सामने की जाए। कश्मीरा की याचिका निचली अदालत ने खारिज कर दी, जिसके खिलाफ उसने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
दोनो पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया जो बूढ़े मां-बाप के लिए भविष्य में मदद की लाठी बन सकता है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब बेटी की शादी होती है तो वो पति के घर की सदस्य बन जाती है। जहां उसे कानून के तहत कुछ अधिकार मिलते हैं। शादी के बाद जब बेटी उसके पिता के पास रहने आती हैं तो वो घर तकनीकि रूप से उसके लिए सिर्फ गेस्ट हाऊस की तरह होगा। यानी अगर मां-बाप चाहें तो ही बालिग औलाद उनके घर में रह सकती हैं।
इस मामले की सुनवाई करते वक्त कोर्ट ने अपना रूख साफ कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जबतक बच्चे नाबालिग होते हैं उनकी परवरिश की सारी जिम्मेदारी उनके मां-बाप पर होती हैं। लेकिन जब वो बालिग हो जाते हैं तो उनका मां-बाप के घर पर कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। और वो उस घर में तभी तक रह सकते हैं जब तक उनके मां-बाप की इच्छा होती है।
बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले से उन सभी माता-पिता को राहत मिली है जो बूढ़े़ हो चुके हैं और जिनके बच्चे उनके घर पर कब्जा कर उन्हें बेदखल करना चाहते हैं। लेकिन सवाल उन लड़कियों का भी हैं जिन्हें ससुराल से निकाल दिया जाता है और जमाने के सवालों से घबराकर मां-बाप उन्हें मायके में रहने की इजाजत तक नहीं देते।
ये सवाल इसलिए अहम है क्योंकि अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि शादी के बाद बेटी का मायका एक तरीके से गेस्ट हाउस की तरह होता है। और ये मां-बाप की इच्छा पर है कि वो बालिग बेटी को घर में रखते हैं या नहीं। कोर्ट ने कहा कि मां-बाप की मौत के बाद बेटी का अपने मां-बाप की संपत्ति पर कुछ अधिकार होता है। लेकिन मां-बाप के जिंदा रहते वो उनकी संपत्ति पर उनकी इजाजत के बगैर कानूनी अधिकार नहीं जता सकती।
भारतीय समाज में ऐसे बहुत से मामले सामने आ रहे हैं जहां किसी वजह से अगर बेटी ससुराल छोड़कर अपने मायके रहने आती हैं तो 'लोग क्या कहेंगे' के डर से मां-बाप उऩ्हें अपने पास रखने के लिए तैयार नहीं होते हैं। अगर लड़की पढ़ी-लिखी है और उसमें इतना माद्दा है कि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं या वो पहले से ही वो अपने पैरों पर खड़ी है तब तो वो स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी गुजार सकती हैं। लेकिन ऐसी लड़कियों का क्या होगा जो कमाती नहीं है और जो शादी से पहले अपने मां-बाप पर निर्भर थीं, शादी के बाद अपने पति पर और रिश्ते में खटास आने पर फिर अपने मां-बाप पर निर्भर हो जाती हैं। अगर ऐसे मामलों में मां-बाप बेटी को अपने साथ रखने को मना कर दें तो क्या उनकी हिफाजत के लिए क्या कोई कानून में तरीका मौजूद है, इस पर भी गंभीर विचार की जरूरत है।
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