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जल को जहर बनाने वाली फैक्ट्रियों पर भ्रष्टतंत्र चुप क्यों?

Posted on Apr 03, 2012 at 04:15pm IST | Updated Apr 03, 2012 at 04:34pm IST

रतलाम। भारती जाटव रतलाम की कालोनी में रहती हैं। इस इलाके में पानी के लिए संघर्ष पिछले कई साल से होता आ रहा है। ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि इलाके में लगा हैंडपंप अब पानी नहीं लाल रंग का जहर उगल रहा है। इलाके में नगर निगम 7-8 दिन में पीने के पानी की सप्लाई करता है। धक्का मुक्की और गाली गलौच अब रोज की बात हो गई है। नगर निगम से पानी की सप्लाई ऐसी है कि मजबूरी में रोजमर्रा के कामों के लिए इसी प्रदूषित पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है।

रतलाम का भूमिगत पानी पिछले 10 साल में जहरीला हो गया और अब लोग साफ पानी की एक एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। रतलाम के भूमिगत पानी का प्रदूषित होना पर्यावरण से हो रहे लगातार हो खिलवाड़ का नतीजा है।

जल को जहर बनाने वाली फैक्ट्रियों पर भ्रष्टतंत्र चुप क्यों?

रतलाम में औद्योगिक विकास के लिए पिछले कई साल से फैक्ट्रियां लगाई जा रही है। इन फैक्ट्रियों में निर्माण प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर औद्योगिक कचड़ा भी तैयार होता है। औद्योगिक कचड़े को खत्म करने और उससे प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी फैक्ट्रियों की होती है। इस काम को फैक्ट्रियां सही तरह से अंजाम दे रही हैं या नहीं ये सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की होती है।




प्रदूषण बोर्ड और फैक्ट्री मालिकों की मिली भगत से जहरीला औद्योगिक कचड़ा सहीं तरह से नहीं निपटाया जा रहा है। ये कचड़ा जमीन में रिस कर भूमिगत पानी को जहरीला कर रहा है। आज रतलाम की फैक्ट्रियों में 23,500 टन से ज्यादा जहरीला कचरा लापरवाही से जहां तहां पड़ा हुआ है और प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड किसी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं कर रहा है।

इधर औद्योगिक कचड़े ने बड़े इलाके के भूमिगत पानी को चपेट में ले लिया है वहीं प्रशासन प्रदूषण के बारे में लगातार गुमराह कर रहा है। अब पब्लिक हेल्थ इंजीनियर विभाग को ही लीजिए, ये सिर्फ़ सात गावों को ही प्रभावित बता कर जलप्रदाय की कार्ययोजना बना रहा है। इस कार्ययोजना की खासियत ये है कि पिछले कई साल से सिर्फ कागजों पर ही है।

2004 की सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की जांच से साफ है कि भूमिगत पानी में नाइट्रेट की मात्रा मानक से तीन गुना और क्लोराइडस की मात्रा मानक से 5 गुना ज्यादा है। पानी का लाल रंग आयरन की अधिकता की वजह से है। इसे पीना और इस्तेमाल करना सेहत के लिए ख़तरनाक है लेकिन प्रशासन की तरफ से पानी की व्यवस्था सुधारने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

प्रशासन पीने के पानी की समस्या सुलझाने और जहरीले कचड़े के निस्तारण के लिए क्या कर रहा है, ये जानने के लिए सिटिजन जर्नलिस्ट अजय दुबे कलेक्टर के पास गए।

कलेक्टर ने प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी प्रदूषण बोर्ड पर और पानी के सप्लाई की जिम्मेदारी नगर निगम पर डाल दी। जिले का प्रमुख अधिकारी होने के नाते उन्होंने खुद कोई पहल करने से साफ पल्ला झाड़ लिया। वहीं, प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के क्षेत्रिय अधिकारी ने कोई पुख्ता कार्य योजना के ना होने की वजह से अधिकारी ने कन्नी काट ली।

सीजे अजय दुबे प्रदेश के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों से अपील करते हैं कि वो इस मामले में लापरवाही ना करें और जल्द कार्रवाई करें।


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