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फिल्म समीक्षा:‘बैटलशिप’ में सिर्फ धमाके हैं और कुछ नहीं

| Apr 14, 2012 at 02:24pm | Updated Apr 14, 2012 at 02:29pm

राजीव मसंद

मुंबई। किसी भी एक्शन फिल्म को जज करने के मापदंड उसमें होने वाले धमाके ही हैं तो मैं कहना चाहूंगा कि निर्देशक पीटर बर्ग की ‘बैटलशिप’ सबसे ऊपर के पायदान पर खड़ी नजर आती है। बर्ग माइकल बे से प्रेरित होकर एक शोरभरी पर काफी बोरिंग फिल्म बनाते हैं।

ये फिल्म ‘ट्रांसफोर्मर्स आन दी हाई सीज’ के तौर पर भी काम कर सकती है। ये शायद इत्तफाक ही हो कि दोनों फिल्में हसबोरो गेम पर आधारित है।

‘बैटलशिप’ की शुरुआत में कुछ अमेरिकन साइंटिस्ट स्पेस में रेडियो सिग्नल भेजते हैं ताकि वो ये पता लगा सके कि क्या बाहरी दुनिया में भी जिंदगी है। इन्हें पता चलता है कि एलिंयस बड़े-बड़े स्पेसशिप में बैठकर धरती की तरफ आ रहे हैं और धरती की सारी शक्तियां कब्जाने की कोशिश करते हैं।

इससे पहले ये लोग धरती और यहां कि मिसाइल को नष्ट कर दें, हवाई कोस्ट पर खड़े एक छोटे से नेवी फ्लीट को पता लगाना है कि आखिर ये लोग कौन हैं और इन्हें कैसे रोका जाए। इसे लीड कर रहे हैं ऑफिसर एलेक्स हूपर के किरदार में टेलर किच। इस तरह की फिल्में काफी हद तक स्पेशल इफेक्ट्स पर निर्भर करती हैं तो इस फिल्म में स्पेशल एफैक्ट्स तो हैं पर उनमें सफाई नहीं है।

कुछ खास सीन फिल्माए गए हैं जिनमें कोई भी खासियत नहीं है।

इसकी कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता था अगर ये फिल्म जरा भी मजेदार होती। हूपर के वॉरशिप पर वेपन ऑफिसर रिहाना हैं जिसे कहीं-कहीं पर बंदूक चलाने का मौका दे दिया गया है और मॉडल ब्रुकलिन डैकर हूपर की दोस्त है जिसे साफ तौर पर अपने से कम साइज के कपड़ों में फिट होने के लिए हायर किया गया है। लिएम नीसन और एलैग्जेंडर स्कार्क्सगार्ड भी फिल्म में छोटे रोल में हैं पर आप उनकी एक्टिंग शायद आप याद ना रख पाएं। मैं इस धमाकों से भरी फिल्म ‘बैटलशिप’ को पांच में से दो स्टार देता हूं।

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