डाल्टनगंज। सिटीजन जर्नलिस्ट अविनाश ने कई बच्चों की जिंदगी में ज्ञान का रोशनी फैलाई है। अविनाश के लिए जिंदगी का मतलब है हंसते हुए मुश्किलों को हल करना। वो खुद विकलांग हैं और दूसरे विकलांग बच्चों के लिये उम्मीद की किरण बने हुए हैं।
गोपी दूसरे बच्चों की तरह चल नहीं सकता लेकिन स्कूल जाना चाहता है। दोस्तों के साथ खेलना चाहता है। उसकी इस ख़्वाहिश को उसके घरवाले तो पूरा नहीं कर सके लेकिन अविनाश ने पूरा कर दिया। दरअसल गोपी जैसे तमाम बच्चों के लिये अविनाश ने डाल्टेनगंज में एक स्कूल खोला है। यहां बच्चे न सिर्फ़ पढ़ते हैं बल्कि उनके लिये खेल और खाने पीने का भी इंतज़ाम है।
अविनाश करीब आठ साल पहले एक सरकारी दफ्तर में गए थे। जहां पन्द्रह साल का एक अपाहिज बच्चा कुछ सरकारी मदद के गुहार लेकर आया हुआ था, लेकिन सरकारी बाबू ने उसकी मदद करने के बजाय उसे दुत्कार कर भगा दिया। इस वाकये ने अविनाश को झकझोर दिया। उस दिन उन्होंने निश्चय किया कि अपाहिज बच्चों के लिए कुछ ऐसा किया जाय, जिससे किसी लाचार को किसी के सहारे की जरूरत न पड़े।
लेकिन अविनाश के लिए ये सब कुछ इतना आसान नहीं था। वो ऐसे बच्चों के लिये एक स्कूल खोलना चाहते थे और स्कूल के लिये ज़रूरत होती है जगह की। जगह हासिल करने के लिये अविनाश को बार-बार अधिकारियों का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा। काफ़ी मेहनत के बाद अविनाश को स्कूल खोलने के लिय़े एक इमारत तो मुहैया करायी गयी लेकिन बाकी की सुविधाएं नाम मात्र को मिल पायीं।
अविनाश बताते हैं कि करीब आठ साल तक संघर्ष करने के बाद भी उन्हें जो सरकारी मदद मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिल पा रही है। अपाहिज बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन सरकार और उसके मुलाजिमों के कान पर जूं नहीं रेंग रही। लेकिन उन्हें कुंभकरणी नींद से जगाने का प्रयास अविनाश लगातार कर रहे हैं और करते रहेंगे।
धीरे-धीरे अविनाश के संघर्ष से दूसरे विकलांग भी जुड़ने लगे और उन्होंने विकलांग संघ बनाया। अब ये संघ विकलांग बच्चों की शिक्षा और भोजन के लिये काम कर रहा है। इतना ही नहीं संघ की कोशिशों से सौ से ज़्यादा विकलांग बच्चों को tricycle दिलायी जा चुकी हैं।












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