जबलपुर। ये कहानी मध्यप्रदेश के जबलपुर जिला की है। इस जिले में वैसे तो बहुत सारी कहानियां हैं। बहुत सारे तीर्थ स्थल हैं। लेकिन इस जिले की एक ऐसी कहानी है जिसे सुनकर आपका दिल पसीज जाएगा।
जबलपुर में एक गांव हैं वर्गी। वहां रहता था एक बेहद धार्मिक लेकिन बहुत ही गरीब परिवार। घर में एक मां थी। उसकी आंखों में रौशनी नहीं थी। मां के दो बेटे थे। दोनों बेटे दो आंखों की तरह। पति भी था।
इस बार मां टूट गई। लेकिन अब भी छोटा बेटा उसके पास था। और एक बार फिर वो अपने इस बेटे को टूटते हुए नहीं देखना चाहती थी। मां ने एक बार फिर संभाला।
गरीबी साथ नहीं छोड़ रही थी। भगवान हर वक्त परीक्षा ले रहे थे। लेकिन मां अपने बेटे के साथ जिंदगी के तमाम ख्वाब बुन रही थी। लेकिन कहते हैं न कि किस्मत का खेल कोई समझ नहीं पाया।
किस्मत जानती है कि किसके तकदीर में क्या है क्योंकि किस्मत कैसे यहां नाच नचाती है ये किसी को नहीं मालूम। पति की मौत हो गई। बड़ा बेटा दुनिया से जा चुका है। और छोटा बेटा एक दिन मां का लिए दातून तोड़ने पेड़ पर चढ़ता है। तमन्ना ये है कि मां को अपने हाथों से दातून कराएगा लेकिन पेड़ से गिर जाता है।
इस बेटे की कमर टूट जाती है। दाहिने हाथ की हड्डी टूट जाती है। जरा सोचिए जब मां को पता चला होगा तो उस पर क्या गुजरी होगी।
वो बच्चे को गोद में लेकर रोती है। इलाज के लिए पैसे नहीं है। कोई साथ देने वाला नहीं है। लेकिन भगवान है। कोई है जो अंदर से एक हौसला दे रहा है। और ये हौसला सिर्फ एक औरत ही हासिल कर सकती है।
कहीं कोई रास्ता नहीं सूझता तो मां आसमान की ओर देखती है। भगवान से कहती है कि अगर उसका बेटा ठीक हो जाएगा तो वो चारों धामों की यात्रा करेगी। अगर उसके जीने का सहारा बचा रहता है तो वो पूरी जिंदगी भगवान की सेवा में लगा देगी।
कहते हैं न कि मां की दुआ के आगे भगवान की ताकत भी काम नहीं करती। यहां भी ऐसा ही होता है। आकाश में बिजली चमकती है। एक रौशनी धरती पर आती है और इस मां का बेटा धीरे धीरे आंख खोलता है।
सोचिए जिसकी कमर टूट गई हो जिसके हाथ की हड्डी टूट गई हो वो बेटा ठीक होने लगता है। और आज से बारह साल पहले जब वो पूरी तरह ठीक हो जाता है तो मां उसके बचने की वजह बताती है।
उससे बताती है कि किस तरह उसने चार धाम की मन्नत मांगी थी। और किस तरह किस्मत जो कभी उसका साथ नहीं देती थी उसने भी साथ दिया। मां की बात सुनकर बेटे का दिल भर जाता है और उसके बाद जो होता है उस पर तो यकींन ही नहीं हो पाता।
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