नई दिल्ली। मैं एक मां हूं...हर वक्त इम्तिहान लेती जिंदगी से लड़कर, अपने बच्चे के बेहतर कल के लिए मैंने अपना आज कुर्बान किया है। मुझे घर को संभालना भी है और घर चलाने के लिए पैसे भी कमाने हैं। रसोई के राशन का बजट भी बनाना है...बच्चे को मां का दुलार तो देना ही है और जरूरत पड़ने पर पिता की डांट भी...उसे खाना भी खिलाना है, शाम को घुमाने भी ले जाना है, मुझे ही उसकी हर जरूरत का ख्याल रखना है।
एक मां होते हुए पिता का फर्ज भी निभाना है। मेरी जिम्मेदारी बांटने वाला कोई नहीं...मेरी तकलीफ समझने वाला कोई नहीं इसीलिए मैंने सीख लिया है लड़ना...अपने आंसुओं को पीना, अपने जख्म छिपा लेना। मैं चाहती हूं कि अपने बच्चे को दुनिया की वो हर खुशी दूं जिससे उसे पिता की कमी कभी महसूस न हो। लेकिन कितनी भी कोशिश कर लूं एक सवाल से नहीं बच पाती तो हर रोज अपने लाडले की आंखो में देखती हूं...वो नन्हीं आंखें जो हर वक्त मुझसे पूछती हैं.. मम्मी मेरे पापा कहां हैं...वो कब आएंगे...!!!

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