नई दिल्ली।देश के मंदिर, मठ और दूसरे धार्मिक स्थलों में अकूत संपत्ति जमा है। हर साल भक्त दिल खोलकर चढ़ावा देते हैं जिनकी कीमत लाखों-करोड़ों में होती है। कई मंदिरों की आय ने तो बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियो को भी पछाड़ दिया है।
भारत मंदिरों और त्योहारों का देश है। सदियों से मंदिरों में लोग चढ़ावा देते रहे हैं। चढ़ावे की वजह से भारत के कई मंदिर अकूत दौलत के स्वामी बन गए हैं। ये दौलत लाखों में नहीं करोड़ों और अरबों रुपए में है। जिनका कोई सही-सही हिसाब नहीं है।

सिर्फ तिरुपति मंदिर ही नहीं, भारत में ऐसे कई मंदिर हैं जिनका सालाना बजट करोड़ों रुपए का है। शिरडी के साईं बाबा मंदिर को देश का दूसरा सबसे अमीर मंदिर माना जाता है। शिरडी के साईं बाबा ट्रस्ट के सदस्यों के मुताबिक तिरुपति बालाजी मंदिर के बाद सबसे ज्यादा चढ़ावा यहीं पर आता है। साल 2008 में 81 करोड़ रुपए नगद, 920 किलो सोना, 440 किलो चांदी चढ़ावे में मिला। 1992 में साईं बाबा ट्रस्ट का सालाना बजट 200 करोड़ रुपए से ज्यादा का है।
गुरुवायुर मंदिर 5000 साल पुराना है। कान्हा के इस मंदिर के पास 400 करोड़ रुपए, 65 हाथी, और अपार सोना-चांदी है। केरला का सबरीमाल मंदिर की भी गिनती देश के अमीर मंदिरों में होती है। पिछले साल यहां 140 करोड़ रुपए चढ़ावे में जमा हुआ। मुंबई में चलने वाले 11 दिन के गणेश उत्सव के दौरान सबसे मशहूर पंडाल लाल बाग के राजा का होता है। श्रद्धालुओं की सबसे ज्यादा भीड़ इसी पंडाल में जुटती है। पिछले साल 11 दिन के उत्सव के दौरान 17 करोड़ रुपए चढ़ावे में मिले। मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में तो ऑनलाइन चढ़ावे की सुविधा है।
पिछले गणेश चतुर्थी में मंदिर में 21 करोड़ का चढ़ाना आया। मुंबई में 11 दिन के उत्सव के दौरान अलग-अलग पंडालों और मंदिरों में कुल 1200 से 1400 करोड़ रुपए चढ़ावे के तौर पर इकट्ठा हुए। साफ है चढ़ावे से देश के मंदिरों में अपार दौलत जमा हो चुकी है। किसी अर्थशास्त्री ने कहा था कि अगर देश के सभी मंदिर और मठों में जमा दौलत को इकट्ठा किया जाए तो देश का सारा कर्ज खत्म हो जाए।
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