नई दिल्ली। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के यूपीए सरकार के साथ साल 2004 से जुलाई 2007 के बीच असहज संबंध रहे। साल 2005 में नौबत यहां तक आ पहुंची थी कि कलाम ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का मन बना लिया था। अंतरात्मा की आवाज पर उन्होंने अपना इस्तीफा लिख भी लिया, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की गुहार के बाद उन्होंने देशहित में अपना फैसला बदल लिया। नई किताब टर्निंग प्वाइंट्स में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। लेकिन तब उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत बाहर थे और इसी वजह से वो तत्काल इस्तीफा नहीं दे पाए।
साल 2005 के दौरान बिहार की जनता ने किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। इस पर विधानसभा निलंबित कर दी गई। कुछ समय बाद जब लालू यादव और रामविलास पासवान को लगा कि नीतीश कुमार किसी तरह सरकार बना लेंगे तो उन्होंने केंद्र पर दबाव डालकर विधानसभा भंग करवा दी। उस समय बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह थे। बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले के समय कलाम रूस की यात्रा पर थे। मास्को के समय के मुताबिक रात करीब 1 बजे उन्हें बिहार विधानसभा भंग करने का फैक्स भेजा गया। कलाम ने आधे-अधूरे मन से इस पर दस्तखत कर दिए।

इस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के फैसले को असंवैधानिक करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बदनीयत से लिया गया निर्णय भी करार दिया। इसके बाद कलाम ने इस फैसले के लिए खुद को भी जिम्मेदार माना और अंतरात्मा की आवाज पर इस्तीफा देने का मन बना लिया। इसी दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसी दूसरे मसले पर चर्चा के लिए कलाम से मिलने पहुंचे। मुलाकात के दौरान कलाम ने सिंह को अपना इस्तीफा दिखाया। इस पर मनमोहन भावुक हो गए। प्रधानमंत्री ने मुश्किल घड़ी में इस्तीफा नहीं देने का आग्रह किया। मनमोहन ने कहा कि इस समय उनके इस्तीफे से सरकार गिर भी सकती है। मनमोहन से मुलाकात के बाद मिसाइल मैन उस रात यही सोचते रहे कि उनका जमीर ज्यादा अहम है या देश, अगली सुबह नमाज के बाद उन्होंने इस्तीफा नहीं देने का फैसला किया।
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