होशियारपुर। सर्प मेध यज्ञ में एक-एक कर धरती के सारे सांप इस हवन कुंड में भस्म हो जाते थे लेकिन वो तक्षक सर्प अपनी रक्षा के लिए भगवान इंद्र की शरण में चला गया।
इंद्र उसकी रक्षा के लिए आगे आना तो चाहते थे। लेकिन यज्ञ इतना विशाल था कि वो तक्षक की कोई मदद नहीं कर पाए।
किसी तरह राजा जनमेजय से ही यज्ञ को समाप्त करने के लिए जाल बुना गया और इस काम के लिए वासूक नाम का नाग आगे आया।
सबसे पहले वह आस्तिक ऋषि के आश्रम में गया। वहां जाकर उनसे विनती की कि वो किसी तरह इस यज्ञ को खत्म करा दें।
फिर ऋषि आस्तिक राजा के पास पहुंचे। राजा से कहा कि ठीक है जो हुआ वो अच्छा नहीं हुआ। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि किसी एक प्रजाति के जीवों को पूरी सृष्टि से ही साफ कर दिया जाए।
राजा जनमेजय को लगा कि ऋषि ठीक कह रहे हैं और इस तरह यज्ञ समाप्त कर दिया गया। लेकिन इसके बाद इस जगह से राजा राजपाठ छोड़कर जंगल में जाकर सन्यासी हो गए। और यहीं से थोड़ी दूर पर है वो जंगल भी जहां राजा जनमेजय से जुड़े तमाम निशान मिलते हैं।
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