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कहते हैं, अमिताभ को काका ने कभी पसंद नहीं किया!

| Jul 19, 2012 at 06:15pm | Updated Jul 19, 2012 at 07:41pm

नई दिल्ली। राजेश खन्ना यानी काका अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन अपने पीछे छोड़ गए कई अनसुनी कहानियां। कहते हैं अमिताभ बच्चन को राजेश खन्ना ने कभी पसंद नहीं किया। वजह थी विजय का आनंद को टेक ओवर करना। काका का मानना था कि अगर अमिताभ नहीं आते तो उनका स्टारडम बना रहता। अमिताभ के इंडस्ट्री में कदम रखते ही रोमांटिक युग का अंत हो गया और अमिताभ ने अपने एंग्री यंग मैन के लुक से हीरो की परिभाषा बदल दी।

70 के दशक में जिस सुपरस्टार ने आने वाले सुपरस्टार को विरासत सौंपी थी। उन्हीं अमिताभ ने तीन साल पहले राजेश खन्ना को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया। दोनों सितारे अपने दौर में खूब चमके, दोनों ने करोड़ों के दिलों पर राज किया। दोनों ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। दोनों बरसों बाद आईफा के स्टेज पर मिले तो अजब समां था। रोमांस का बादशाह, एंग्री यंग मैन से मिल रहा था।

आनंद में जब अमिताभ आए तो राजेश खन्ना डायरेक्टर के फैसले से खफा थे। जानने वाले कहते हैं कि राजेश खन्ना बेहद असुरक्षा महसूस करते थे। वो अपना सिंहासन छोड़ने को तैयार न थे। यहां तक कि वो अमिताभ के साथ स्क्रीन पर दिखना तक नहीं चाहते थे। मगर डायरेक्टर के अपने तर्क थे। करीबी तो यहां तक कहते हैं कि आनंद के बाद से राजेश अमिताभ से दूरी रखने लगे। 1973 में आई अमिताभ की फिल्म जंजीर ने दरार पैदा कर दी। एक सितारा जन्म ले चुका था। एंग्री यंगमैन आ चुका था, जो जनता के दुखदर्द को आवाज दे रहा था।

अमिताभ ने राजेश खन्ना से उनकी स्टारडम छीन ली थी। रोमांस का युग खत्म हो रहा था। असल में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के बीच ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म बावर्ची की शूटिंग के दौरान ही खटास पैदा हो गई थी। दोनों के बीच बातचीत बंद हो गई थी। अमिताभ सेट पर जया को लेने आते थे। बावर्ची बनने के दौरान मौजूद लोग बताते हैं कि एक बार जया ने सेट पर यहां तक कह दिया था कि एक दिन अमिताभ राजेश खन्ना से बड़े सुपरस्टार होंगे। सुपरस्टारडम पर इतरा रहे राजेश गुमनामी के अंधेरे में खो जाएंगे।

बावर्ची में अमिताभ ने सिर्फ आवाज दी थी। इसी साल राजेश खन्ना ने अमिताभ के साथ आखिरी फिल्म की नमक हराम। नमक हराम में अमिताभ का किरदार राजेश खन्ना से ज्यादा मजबूत बन गया था। 80 का दशक अमिताभ बच्चन का दशक था। राजेश खन्ना गुमनामी के अंधेरों में खो गए थे। विजय का गुस्सा आनंद की रोमांस पर भारी पड़ गया था। 90 के दशक में जब बुरा दौर आया तो अमिताभ सियासत की तरफ मुड़े, लेकिन दोस्त राजीव के चक्कर में बोफोर्स के भूत ने उन्हें भी जकड़ लिया। आखिर अमिताभ ने सियासत को अलविदा कह दिया। कहते हैं कि राजीव गांधी ने अमिताभ को करारा जवाब देने के लिए राजेश खन्ना को न्योता दिया।

1991 में राजेश खन्ना ने कांग्रेस के टिकट पर नई दिल्ली से चुनाव लड़ा। सामने थे बीजेपी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी। राजेश खन्ना हार गए। जब आडवाणी ने नई दिल्ली सीट छोड़ी तो राजेश शत्रुघ्न सिन्हा को हराकर सांसद बन गए। मगर सियासत रास नहीं आई और राजेश खन्ना ने उसे अलविदा कह दिया। वो मुंबई लौटे जहां अमिताभ केबीसी के जरिए दूसरी पारी शुरू कर चुके थे। छोटे पर्दे पर राजेश खन्ना के लिए जगह नहीं रही थी और जब जगह मिली भी तो ये फिल्म खत्म होने को थी।

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