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पढ़ें: अन्ना का आंदोलन...रणनीति, दशा और दिशा!

Posted on Jul 23, 2012 at 07:08pm IST | Updated Jul 24, 2012 at 11:22am IST

नई दिल्ली। बीते साल अगस्त का महीना था। रामलीला मैदान में अन्ना लगातार हुंकार भर रहे थे, सरकार-विपक्ष सब बिना तोप-तलवार के ही घुटनों पर थे। संसद ने एक मत से एक रिजोलूशन पास किया। ये मेरे लिए ही नहीं उन सबके लिए चौंकाने वाली चीज थी जिन्होंने जेपी और उनसे पहले के आंदोलनों को नहीं देखा। जिन्होंने नहीं देखा कि सरकारें हकीकत में संसद से सड़क तक किस तरह जनमत की मोहताज होती हैं। उसी मैदान में सही मायने में देश में एक तीसरी ताकत का उदय हुआ जिसे हम टीम अन्ना कहते हैं।

तीसरी ताकत बनी टीम अन्ना ने भारतीय लोकतंत्र को झकझोरने वाले कई सवाल उठाए हैं जिनमें करप्शन रोकने के लिए जनलोकपाल शामिल है। बेशक लोगों ने ही नहीं, मीडिया ने भी उनके अभियान को हाथोंहाथ लिया। बीते साल जंतर-मंतर पर जब अन्ना, अनशन पर बैठे तो गुजरते घंटों के साथ वक्त के माथे पर ऐसी लकीर खिंचने लगी जिसने भारत के भविष्य में बड़े बदलाव समाए हुए थे। इस आंदोलन में अभी तक कुल तीन टर्निंग प्वाइंट आए हैं। पहले दो ने जनता और सरकार के बीच उनका लोहा मनवाया और तीसरे ने उन्हें अहसास कराया कि सबकुछ इतना भी आसान नहीं है।

पढ़ें: अन्ना का आंदोलन...रणनीति, दशा और दिशा!

पहला टर्निंग प्वाइंट




जनलोकपाल के लिए जनपथ पर टीम अन्ना का अनशन पहला टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। बेशक पहला दिन सुगबुगाहट भरा था लेकिन भीड़ अगले दिन से आना शुरू हो गई। फिर उसके बाद मीडिया ने जो कवरेज दिया उससे हालात एकदम नया रूप लेने लगे, जो आंदोलन चंद लोगों के बीच सिमटा हुआ था वो अब सैलाब की तरह हर तरफ फैलने लगा। आंदोलन जरूर जंतर मंतर पर हो रहा था लेकिन उसका असर पूरा भारत टीवी के माध्यम से महसूस कर रहा था।

दूसरा टर्निंग प्वाइंट

दूसरा टर्निंग प्वाइंट रहा अगस्त में अन्ना का रामलीला मैदान का अनशन। यहां ये कहना होगा कि सरकार की नासमझी और अन्ना के कॉमन सेंस ने सबकुछ पलट कर रख दिया। जब टीम अन्ना अनशन पर आमादा दिखी तो सरकार ने टीम अन्ना को रामदेव की तर्ज पर गिरफ्तार कर पूरे मामले की हवा निकालने की कोशिश की लेकिन वो कोशिश टीम अन्ना के लिए वरदान साबित हुई। अन्ना को जब उनके दिल्ली के निवास से गिरफ्तार किया गया तो अन्ना ने उसका प्रतिरोध नहीं किया। वो जेल में गए और जैसे ही ये खबर चैनलों पर आई वैसे ही भीड़ का तिहाड़ जेल के बाहर जुटना शुरू हो गया। अन्ना ने बाहर जाने से इंकार कर दिया। सरकार की पेशानी पर बल पड़ गए। गुजरता एक-एक सेकंड सरकार को सालों के बराबर लगेना लगा। आखिरकार वे बाहर निकले एक विजेता की तरह। टीम अन्ना को करीब से जानने वाले बताते हैं कि तब तक अन्ना की टीम अवाक थी। उसे नहीं पता था कि क्या करना है। उनके पास आगे की कोई रणनीति नहीं थी लेकिन अन्ना की आम समझ सरकार के स्मार्ट मैनेजरों के आगे इक्कीस साबित हुई। वो जेल से बाहर न जाने पर अड़े, सरकार को झुकना पड़ा वो रामलीला मैदान में अनशन न तोड़ने पर अड़े, सरकार को झुकना पड़ा। पूरी संसद ने उनके प्रति सहानुभूति जताई और तीन बिंदुओं का एक रिजोलूशन पास किया। सही मायनों में ये अन्ना की सरकार और विपक्ष दोनों पर एक अनकही जीत थी। इस जीत ने अन्ना के आंदोलन को एक नया आकार दिया। टीम अन्ना के चेहरे मीडिया और पब्लिक दोनों के फेवरेट बन गए।

तीसरा टर्निंग प्वाइंट

तीसरा टर्निंग प्वाइंट तब आया जब अन्ना के मुंबई आंदोलन के दौरान भीड़ गायब हो गई। जल्दबाजी में अनशन खत्म कर दिया गया। इस दौरान की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस टीम अन्ना के लिए इस आंदोलन की सबसे मुश्किल प्रेस कॉन्फ्रेंस साबित हुई। पत्रकार एक के बाद एक सवालों के तीर दाग रहे थे पहले अन्ना ने उनका सामना करने की नाकाम कोशिश की फिर केजरीवाल आए लेकिन उनके जवाब भी नाकाफी साबित हुए। ये मोड़ टीम अन्ना के लिए कई झंझट और आत्मंथन की सीख छोड़ गया। अन्ना से जब एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार ने ये पूछा कि संसद में तो सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बीजेपी भी आपके जनलोकपाल का विरोध करती है तो फिर आप सिर्फ सरकार को क्यों निशाना बनाते हैं, अन्ना और केजरीवाल इस सवाल का ठीक से कोई जवाब नहीं दे पाए। मैं पहले भी कह चुका हूं कि मीडिया की किसी चीज में रुचि एक तूफान की सवारी की तरह है जो आप को झटके में ऊपर ला सकता है तो उसी तरह जमींदोज भी कर सकता है। टीम अन्ना के आंदोलन को उस दिन सबसे बड़ा झटका लगा।

दरार

मुंबई आंदोलन के बाद टीम अन्ना हद से ज्यादा हताश थी। जानकार कहते हैं कि टीम अन्ना के बीच हर मसले पर हद से ज्यादा मतभेद हैं। तब से लेकर अब तक लगातार टीम अन्ना में दरार होने, उनके साथियों के छिटकने की खबरें आती रही हैं। इसका सच जानने के लिए आईबीएनखबर ने टीम अन्ना से अलग हो चुके मुफ्ती शुमून काजमी और टीम अन्ना का वेब ऑपरेशन संभाल रहे शिवेंद्र सिंह चौहान से बात की। बातचीत में दोनों ने एक बात पर सहमति जाताई कि टीम अन्ना में इंटरनल डेमोक्रेसी का अभाव है। काजमी ने सीधे केजरीवाल पर अपनी चलाने का आरोप लगाया। (इन दोनों के टीम अन्ना से जुड़ने और विवाद को लेकर हुई लंबी चर्चा आप आगे दिए गए इनके ऑडियो लिंक के माध्यम से सुन सकते हैं। शिवेंद्र सिंह चौहान / मुफ्ती शुगून काजमी) शिवेंद्र ने केजरीवाल से विवाद के बाद एक पत्र कोर कमिटी को लिखा था जिसमें उन्हें बाहर करने की बात पर उन्होंने कुछ सवाल पूछे थे। इस बारे में जब टीम अन्ना की सदस्य शाजिया इल्मी से पूछा गया तो उनका कहना था कि असहमति तो होती है लेकिन ये विवाद उतना बड़ा नहीं। इस सवाल पर कि क्या शिवेंद्र के सवालों का कोई लिखित जवाब दिया गया तो उनका कहना था कि उन्हें इस बारे में सही जानकारी नहीं है लेकिन जरूरी होगा तो दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि उनसे खुद केजरीवाल कह चुके हैं कि अगर शिवेंद्र नाराज है तो मैं खुद उससे माफी मांग लेता हूं। इंटरनल डेमोक्रेसी के अभाव के आरोपों पर उनका कहना था कि ये बिल्कुल नहीं है। सबको मीटिंग में अपनी बात कहने की आजादी है। उन्होंने जोड़ा कि कई बार तो ऐसा होता है कि केजरीवाल चिल्लाते रह जाते हैं और लोग अपनी बहस में उनकी सुनते ही नहीं हैं। (ऑडियो सुनें) शाजिया इल्मी ने टीम अन्ना के अंदर किसी भी असहमति के बात से साफ इनकार किया लेकिन हालात ये साफ इशारा कर रहे हैं कि तस्वीर उतनी साफ नहीं है जितनी कि दिख रही है।

अन्ना बनाम केजरीवाल

जानकार मानते हैं कि अन्ना का अंदाज सीधा और स्पष्ट है। कई बार उन्होंने अपनी टीम की कही हुई बात को पलट दिया। टीम ने पीएम या प्रणब मुखर्जी पर जब जब टिप्पणी की तो अन्ना का शुरुआती जवाब टीम से मेल नहीं खाता था। 23 जून को सलमान खुर्शीद अन्ना से मिले ये बात अन्ना ने केजरीवाल को ये कहकर बताई कि उनकी सरकार से बात चल रही है लेकिन क्या ये बताया गया कि उनकी खुर्शीद से मुलाकात हुई है, इस बात पर असमंजस है। दूसरा, अन्ना रामदेव के साथ आगे बढ़ने को तैयार हैं लेकिन केजरीवाल इस पर सहमत नजर नहीं आते। ऊपरी तौर पर सबकुछ शांत लगे लेकिन अंदरखाने जरूर कोई स्ट्रैटजी बन रही है। इस बार आंदोलन के पर्चों में केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और कृष्ण राय को प्रमुख तौर पर दर्शाया गया है। पर्चे की भाषा कहीं न कहीं ये संकेत देती है कि टीम अन्ना आने वाले कल में टीम केजरीवाल का रूप भी ले सकती है। बेशक केजरीवाल ने इस संदेह पर एक से अधिक चैनलों पर अपनी राय जाहिर की है। पर अगर ऐसा नहीं है तो अन्ना को आंदोलन में इतनी प्रमुखता क्यों नहीं दी गई।

आंदोलन का ब्लू प्रिंट

जानकार मानते हैं कि मुंबई की असफलता के बाद आंदोलन का एक ब्लू प्रिंट बनाया गया है। बाकायदा रणनीति तय हुई है। प्रदेश स्तर पर प्रतिनिधि चुने गए जो खुद चुनकर वॉलंटियर तैयार कर सकें। टीम का ढांचा किस तरह बन रहा है ये भी साफ नहीं है। एक आरोप है कि केजरीवाल ने इन सबकी कमान संभाल रखी है जबकि शाजिया इल्मी का कहना है कि ये काम वो नहीं करते। बहरहाल आगे के आंदोलन बकायदा रणनीति बनाकर ही चलाए जाएंगे।

टीम अन्ना और राजनीति

अगस्त के बाद से ही ये सवाल कई बार उठ चुका है कि टीम अन्ना क्या राजनीति में शामिल होगी। सीधा जवाब हमेशा न ही रहा है। पर ऐसा नहीं है कि टीम अन्ना के बीच चर्चा नहीं होती है। शाजिया इल्मी के मुताबिक इस मुद्दे पर एक नहीं कई बार चर्चा हुई है कि क्या राजनीति में सीधे प्रवेश किया जाए या फिर ऐसे लोगों को ट्रेंड किया जाए जो राजनीति में हिस्सा ले सकते हों। इल्मी के मुताबिक टॉप 5 के बीच इसे लेकर अलग अलग राय है। बीच में इस तरह की खबरें भी आ चुकी हैं कि प्रशांत भूषण सीधे राजनीति में उतरने के समर्थक हैं। पर होगा क्या, इस पर सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक राजनीति में सीधे जाने पर एक भय है कि इससे सीधे कांग्रेस को फायदा होगा क्योंकि टीम अन्ना की नजर में जो लोग भी आंदोलन में आ रहे हैं या फिर उसके समर्थक हैं वो कांग्रेस के विरोधी हैं। ऐसे में कांग्रेस विरोधी वोट बंटेगा और कांग्रेस को फायदा होगा। हां, इस बहस से ये इशारा जरूर मिल चुका है कि टीम अन्ना पूरी तरह तटस्थ नहीं रहेगी। किसी न किसी रूप में वह आगामी लोकसभा चुनावों को प्रभावित करेगी।

टीम अन्ना और मीडिया

इस आंदोलन को इतना बड़ा आंदोलन बना देने में मीडिया का कम बड़ा योगदान नहीं है। ये मीडिया ही है जिसने इतनी शिद्दत से इस आंदोलन को कवरेज दिया कि इसके लिए उसे कई बार सरकार की अनकही नाराजगी भी झेलनी पड़ी। आरोप लगा कि मीडिया बात को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहा है। वो जनता को चुने हुए प्रतिनिधियों के खिलाफ भड़का रहा है। टीम अन्ना के आंदोलन को काफी करीब से कवर कर रहे टीवी के वरिष्ठ पत्रकार विक्रांत यादव की नजर में ये सही है कि मीडिया ने आंदोलन को जमकर दिखाया पर उनके मुताबिक जब जरूरी हुआ तो मीडिया ने उसकी आलोचना भी की। (इस आंदोलन की मीडिया कवरेज कैसे हुई इस पर आप विक्रांत से हुई विस्तृत बातचीत का ऑडियो लिंक यहां सुन सकते हैं) विक्रांत के मुताबिक मीडिया को दोष देना सही नहीं होगा। मीडिया ने इस आंदोलन की समय गुजरने के साथ काफी संभलकर रिपोर्टिंग की है।

अन्ना के आंदोलन का भविष्य

शुरू में जरूर लगा कि आंदोलन बड़े ताकतवर तरीके से उठा है लेकिन लगातार आंतरिक मतभेदों और विवादों ने इसकी छवि को काफी धक्का पहुंचाया है। बेशक टीम अन्ना कहे कि सब कुछ ठीक है लेकिन इनसे ये सवाल पूछा जाता रहेगा कि बिना हेल्दी इंटरनल डेमोक्रेसी के आप देश के लोकतंत्र की कमियां दूर करने की बात कैसे कर सकते हैं। इस टीम के कई अहम सदस्य बीते कुछ महीनों में इसे छोड़ चुके हैं। सवाल ये है कि कमियां अभी ही क्यों नजर आईं। अगर वो गलत थे तो आपने उन्हें आंदोलन में साथ क्यों लिया। अगर ऐसा नहीं है तो क्या आंदोलन किसी एक या दो लोगों की मर्जी का गुलाम तो बनने नहीं जा रहा। टीम अन्ना के मौजूदा और पूर्व सदस्यों से बात करने पर एक बात तो साफ होती है कि टीम में सहमति और तालमेल का भारी अभाव है जो किसी लक्ष्य को पाने में बड़ी बाधा साबित हो सकता है। टीम अन्ना के लोगों ने आरोप लगाया है कि उन्हें मीटिंग के मिनिट्स या तो दिए नहीं जाते थे या फिर आधे अधूरे दिए जाते थे। बेशक इसमें दो राय नहीं कि ये आंदोलन अगर दिशा पकड़ता है तो तीसरी ताकत में रूप में अपना अस्तित्व बनाए रखेगा लेकिन अगर इसी तरह आपसी फूट और सही रणनीति का अभाव रहा तो रास्ता सचमुच मुश्किल भरा हो सकता है।

बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होना जरूरी है क्योंकि लोकतंत्र में जो काम हमारी राजनीतिक पार्टियों को करना था वो कर न सकीं। देश ने उन्हें 6 दशक से ज्यादा का समय दिया, जो काफी है। ऐसे में टीम अन्ना की अगुआई में इन मुद्दों को उठाया और लागू कराया जा सकता है। पर सवाल ये है कि क्या रथ का सारथी कृष्ण है या नहीं क्योंकि रथ पर सवाल अर्जुन रूपी जनता सिर्फ प्रदर्शन करती है लेकिन मंच तो किसी कृष्ण को ही तैयार करना होगा। टीम अन्ना का फेल होना भारत की राजनीतिक पार्टियों को मनमानी करने का एक एक्सटेंशन मिलने जैसा होगा जो कितना लंबा खिंचेगा, कहा नहीं जा सकता।


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