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जैसी परिस्थितियां होंगी वैसा काम करूंगा: प्रणब

Posted on Jul 23, 2012 at 09:09pm IST | Updated Jul 23, 2012 at 09:16pm IST

नई दिल्ली। प्रणब मुखर्जी भारी मतों देश के 13वें राष्ट्रपति चुने गए हैं, उन्हें 25 जुलाई को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई जाएगी। शपथ लेने से पहले CNN-IBN की डिप्टी एडिटर सागरिका घोष ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से बातचीत की। प्रणब ने बेबाकी के साथ मौजूदा राजनीति पर अपने विचार रखे। हालांकि अफजल गुरु को फांसी देने को लेकर शिवसेना के सवाल पर प्रणब साफ-साफ बोलने से बचते रहे।

प्रणब से पूरी बातचीत पढ़ें :-

जैसी परिस्थितियां होंगी वैसा काम करूंगा: प्रणब

सागरिका- स्वागत है प्रणब जी आप भारत के 13वें राष्ट्रपति और पहले बंगाली राष्ट्रपति बनने वाले हैं, बहुत-बहुत बधाई इस जबर्दस्त जीत के लिए!




प्रणब- धन्यवाद।

सागरिका - आपको कैसा लग रहा है?

प्रणब- निश्चित ही मुझे संतुष्टि भी है और खुशी भी, खासकर मैं इस बात से खुश हूं कि जो राजनीतिक पार्टियां हमारे साथ नहीं हैं और जिन्होंने मुझे समर्थन का वादा किया था, वो पूरी तरह प्रतिबद्ध रहे और उन्होंने सुनिश्चित किया कि इलेक्टोरल कॉलेज में मौजूद उनकी पार्टी के हर सदस्य का वोट मुझे मिले। आमतौर पर ऐसा नहीं होता, इसलिए मैं इसे अपने लंबे सार्वजनिक जीवन के लिए एक बड़ा पुरस्कार मानता हूं कि मैं ऐसे राजनीतिक दलों का समर्थन, प्यार और सद्भाव पा सका जिन्होंने पार्टी लाइन से हटकर ये समझदारी दिखाई और जो बेहद जरूरी था।

सागरिका- आपकी बहन अन्नपूर्णा देवी की आंखों में आंसू छलक आए थे और बीरभूम में आपके रिश्तेदार आप पर गर्व महसूस कर रहे हैं, आपको क्या लगता है कि बीरभूम के मिराती जैसे इलाके का, वहां पला-बढ़ा शख्स आज राष्ट्रपति है, एक अविश्वसनीय यात्रा है?

प्रणब- ये आप लोगों का काम है कि आप इसे विश्वसनीय मानें या अविश्वसनीय, लेकिन मुझे भी लगता है जब मैंने नामांकन दाखिल किया, अचानक मेरी आंखों के सामने मेरी माताजी का चेहरा आ गया, वो राजनीतिक दृष्टि से काफी संवेदनशील और जागरुक थीं और स्वाभाविक भी था क्योंकि मेरे पिताजी 1920 से ही राजनीति में थे। एक लंबा वक्त और बाकी लोगों की तरह वो भी तब एक घरेलू महिला थीं और पिताजी की जिंदगी दो हिस्सों में बंटी हुई थी या तो जेल में या जेल से बाहर। जब जेल से बाहर होते थे तो वो घर में नहीं होते थे। वो दूसरी राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त होते थे, तब अचानक मेरे मन में ख्याल आया कि आज वो क्या कहतीं जब मैं राष्ट्रपति बनने जा रहा हूं, क्योंकि मुझे एक घटना याद आई, जब मैं 1982 में वित्तमंत्री बना तब उनकी पहली प्रतिक्रिया थी काम बहुत बढ़ जाएगा। तब मुझे लगा कि उन्होंने सोचा होगा कि मेरा काम बहुत बढ़ गया होगा। हालांकि ऐसा नहीं था लेकिन उनकी सोच यही थी।

सागरिका- और अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि आप बहुत दुरांतो छेले?

प्रणब- बहुत ज्यादा, क्योंकि मैं उन्हें बहुत बहुत परेशान करता था। क्योंकि मेरे पिता बहुत साधारण इंसान थे कई बार मेरी पिटाई कर दिया करते थे लेकिन मेरी दीदी हमेशा मुझे बचाती थीं। मानो अगर मैंने 10 गलतियां कीं तो वो कहतीं कि 10 नहीं एक-दो गलतियां की हैं, तो वो हमेशा मेरी तरफ से बोलती थीं। मुझे नहीं पता कि इसके पीछे उनकी क्या सोच होती थी।

सागरिका- क्या आपकी जड़ें आज भी मिराती, बीरभूम में हैं, क्या आज भी उसे आप अपना घर कहते हैं?

प्रणब- मेरी जड़ें आज भी वहीं हैं और बहुत कम अपवाद होंगे। वरना मैं हमेशा वहां जाता रहता हूं। ज्यादातर दुर्गापूजा पर मैं वहां जाता हूं।

सागरिका- बहुत से बंगाली आज खुश हैं। ये बंगाल के लिए बड़ा दिन है। क्या आपको लगता है कि आपकी जड़ें तो बंगाल में हैं लेकिन आपकी सोच राष्ट्रीय रही है, क्षेत्रीय जड़ों के साथ एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व कैसे देखते हैं इसे?

प्रणब- मैं इसे ऐसे देखता हूं, ये ठीक है कि राजनीति में मेरी शुरुआत राज्य से हुई थी और वो भी एक क्षेत्रीय पार्टी में। पहले मैंने बांग्ला कांग्रेस से 1960 के मध्य में शुरुआत की। 3-4 साल बाद मैं कांग्रेस में आया, मेरी एक क्षेत्रीय पार्टी में जगह थी लेकिन जब मैं संसद में आया तो मेरा सक्रिय राजनीतिक जीवन संसद में ही शुरू हुआ। और मैं कभी स्थानीय प्रशासन या राज्य विधानसभा में नहीं रहा। मैं हमेशा राज्य या क्षेत्रीय नजरिए से नहीं बल्कि क्षेत्रीय विभेदों को तोड़ने का हिमायती रहा। ये एक अलग बात है। मेरी सोच हमेशा राष्ट्रीय रही। क्योंकि मुझे एक फायदा मिला जब मैंने राज्यसभा में कदम रखा तो उस वक्त बड़ी-बड़ी हस्तियां, कई पुराने स्वतंत्रता सेनानी जैसे महावीर त्यागी, एपी जॉय, सभी राज्यसभा सदस्य थे। इनमें से कई जो कांग्रेस के थे, 1950 के दशक में मंत्री रहे थे। महावीर त्यागी 1957 में मंत्री रहे थे तो एपी जॉय 1957 में मंत्री थे नेहरू की कैबिनेट में। जयरामदास 1950 में। और विपक्ष में भी ऐसे कई लोग थे जिनके बीच मुझे बैठने का मौका मिला, प्रो. रत्नास्वामी थे, भूपेश गुप्ता थे, पंडित पीतांबरदास थे। और शायद 6-7 महीनों बाद आडवाणी जी ने राज्यसभा ज्वाइन कर ली। तो उस वक्त का माहौल ही राष्ट्रीय था।

सागरिका- तो एक तरह से ये राजनीति की मुख्यधारा को बंगाल की देन है, अगर आप देखें तो 1939 में नेताजी कांग्रेस से बाहर हो गए थे, ज्योति दा 1996 में प्रधानमंत्री नहीं बन पाए तो बंगाली को कभी वो ऊंचा संवैधानिक पद नहीं मिल पाया था। तो क्या आप इसे राष्ट्रीय मुख्यधारा को बंगाल की देन मानते हैं?

प्रणब- ये भी आप लोगों का आंकलन है, मेरा नहीं। हां, एक चीज सही है कि बंगाल राजनीतिक दृष्टि से बहुत संवेदनशील और आगे रहा है। कुदरतन उनकी राष्ट्रीय आकांक्षाएं रहीं, जो गलत नहीं है। हालांकि सौभाग्य से लोकसभा अध्यक्ष के बतौर सोमनाथ चटर्जी रहे हैं। मेरा ख्याल है कि वो पहले बंगाली स्पीकर थे, लेकिन जब 1952 में राज्यसभा गठित हुई तो पहले राज्यसभा लीडर एक बंगाली थे चारुचंद्र बिस्वास, वो नेहरू की कैबिनेट में मंत्री रहे थे। हां, ये ठीक है कि तब न तो आप और न राजदीप ही पैदा हुए थे।

सागरिका- इतिहास को लेकर आपकी याद्दाश्त गजब की है। इसकी वजह क्या है, क्या आप बहुत पढ़ते हैं या इन हस्तियों की जिंदगी के बारे में आपने बहुत पढ़ा है?

प्रणब- मैं आपको साफ-साफ कहूं तो मैं केवल एक बार नहीं पढ़ता, मैं कई-कई बार पढ़ता हूं। यहां तक कि जो कहानियां मुझे पसंद हैं, वो मैं बार-बार पढ़ता हूं।

सागरिका- और आप पढ़ते कब हैं क्योंकि आप दिन में 18 घंटे तो काम करते हैं?

प्रणब- मेरे पढ़ने का वक्त बड़ा अनिश्चित है। जब भी वक्त मिलता है मैं कुछ न कुछ पढ़ लेता हूं या तो मैं कोई फाइल पढ़ रहा होता हूं या दूसरे कागज। या फिर किताब पढ़ रहा होता हूं, मैं खाली नहीं बैठ सकता।

सागरिका- क्या आप टीवी देखते हैं?

प्रणब- बहुत कम।

सागरिका- आपने कहा कि आपकी जड़ें बंगाल में हैं। लेकिन ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने भारी मन से आपको वोट दिया है, क्या आप उनको कोई संदेश देना चाहेंगे?

प्रणब- इसे अब भूल जाना चाहिए, मैंने उनसे बात की, वो बहुत अच्छी हैं। मैंने उन्हें शपथग्रहण में भी बुलाया है और मुझे उम्मीद है कि वो आएंगी।

सागरिका- लेकिन विपक्ष ने जैसे आरोप लगाए हैं तो क्या आपको उनसे चोट पहुंची?

प्रणब- मुझे लगता है कि उनसे बचा जा सकता था। क्योंकि इनमें से एक भी सही नहीं है और अब इस वक्त मैं किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता। मैंने उन्हें पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने वही किया जो उन्हें ठीक लगा। बस, मैं इससे बिल्कुल परेशान नहीं। मैंने इस मौके पर साफ कर दिया है कि मैं किसी के प्रति बुरी भावना नहीं रखता।

सागरिका- क्या आप सभी के राष्ट्रपति होने जा रहे हैं?

प्रणब- बिल्कुल, जिस क्षण रिटर्निंग ऑफिसर ने घोषणा की उसी क्षण मैं सभी का राष्ट्रपति हो गया।

सागरिका- अगर ये कहें कि आप पुराने तरह के राजनीतिज्ञ हैं जिसके सभी राजनीतिक पार्टियों में दोस्त हैं। आपके विरोधी तो हो सकते हैं लेकिन दुश्मन नहीं। क्या इस तरह की राजनीति आज खत्म हो रही है, जबकि राजनीति तो विचारों का संघर्ष है, किसी निजी दुश्मनी का नहीं, पर आज जब आप ध्रुवीकरण की राजनीति देखते हैं तो क्या लगता है?

प्रणब- कभी कभी मुद्दों पर ध्रुवीकरण भी होता है। लेकिन ये मुद्दों पर ही होना चाहिए, मैंने आजादी के बाद की राजनीति देखी है। हालांकि आजादी से पहले या उसके तुरंत बाद मुझे इसमें भागीदारी का सौभाग्य नहीं मिला। लेकिन 1960 के दशक से बल्कि कहें कि 1970 के दशक में एक खास वक्त पर राजनीति कांग्रेस विरोधी थी। लेकिन तब मुझे नहीं लगता था कि ये सही संकेत नहीं हैं। लेकिन आज मैं मानता हूं कि पूरी तरह से कुछ राजनीतिक ध्रुव बन जाएं। हां, मुद्दों पर चाहे वो राज्यों के आर्थिक अधिकारों का मामला हो, पूरी अर्थव्यवस्था को बाजार को सौंपने या उसमें सामाजिक हस्तक्षेप का मुद्दा हो। ऐसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, दो-तीन नजरिए हो सकते हैं। इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इन पर ध्रुवीकरण हो जाए, तब तो संघर्ष होगा, नफरत पैदा होगी।

सागरिका- क्या आपको लगता है कि नफरत बहुत बुरी चीज है, जो आज राजनीति में घुस गई है?

प्रणब- हां, बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।

सागरिका- बहुत से लोगों का मानना है कि आप राष्ट्रपति के बतौर लोगों को करीब लाने का काम करेंगे, तो क्या आप ऐसे शख्स की भूमिका निभाने जा रहे हैं जो दो आपस में विरोधी पार्टियों को एक-दूसरे के करीब लाने का काम करेगा?

प्रणब- मैंने अभी तक अपनी भूमिका के बारे में सोचा नहीं है, जैसी परिस्थिति होगी वैसा काम करूंगा। भारतीय राष्ट्रपति की भूमिका संविधान में एकदम साफ-साफ लिखी हुई है। इसके अलावा पुराने राष्ट्रपतियों के कामों पर कई ग्रंथ भरे पड़े हैं।

सागरिका- आप इस पद को कैसे बदलने वाले हैं। या कहें कि आपका क्या रुख होगा?

प्रणब- ये परिस्थिति पर निर्भर है। आप अपने रुख के बारे में पहले से नहीं सोच सकते।

सागरिका- कौन सा राष्ट्रपति आपका आदर्श है जैसे राधाकृष्णन, राजेंद्र प्रसाद, जाकिर हुसैन या वैंकटरामन?

प्रणब- सभी ने अपना कीमती योगदान दिया है और ये कहना ठीक नहीं होगा कि इनमें से कौन सा आदर्श होगा क्योंकि संविधान एक जिंदा दस्तावेज है। जिसका पालन कराना होता है। इसे इस्तेमाल में लाना होता है। राष्ट्रपति इसीलिए संविधान का संरक्षक होता है। हमेशा वो रिव्यू करता रहता है। 1950-60 की स्थितियां आज नहीं हैं और जो आज हैं वो 20 साल बाद नहीं होंगी।

सागरिका- आपकी नजर में भारत के महानतम राष्ट्रपति कौन से हैं?

प्रणब- मैं इस पर कुछ नहीं कहना चाहता, ये काम इतिहासकारों और शोधार्थियों का है।

सागरिका- क्या ऐसा कोई मुद्दा है जिसे आप उठाना चाहेंगे, जैसे कलाम ने विज्ञान और तकनीक को उठाया था?

प्रणब- हर राष्ट्रपति ने कोई न कोई मुद्दा उठाकर उसे आगे बढ़ाया है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। कुछ राष्ट्रपतियों ने संविधान के मुताबिक अपनी भूमिका निभाई है। हर राष्ट्रपति ने विकास में रुचि दिखाई है। समय-समय पर परिस्थिति भिन्न रही है तो ये परिस्थिति पर निर्भर करेगा?

सागरिका- एक आखिरी सवाल, आपके राष्ट्रपति काल में आपके सामने कुछ चुनौतियां हैं। अफजल गुरु की दया याचिका पर शिवसेना ने कहा है कि स्टैंड लेना चाहिए। आप इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे?

प्रणब- मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता जब तक मैं पद नहीं संभाल लेता और तब देखूंगा।

सागरिका- कौन सी राजनीतिक हस्ती से आप प्रभावित हैं, जैसे ज्यादातर लोग कहते हैं कि विधान रॉय से प्रभावित हैं?

प्रणब- डॉक्टर रॉय एक महान व्यक्तित्व थे, मैंने पहले पहले अजॉय बाबू के साथ काम शुरू किया था। फिर बाद में राष्ट्रीय राजनीति में आया और मुझे बनाया इंदिराजी ने।

सागरिका- राष्ट्रपति भवन में अब बड़ी लाइब्रेरी होगी?

प्रणब- हां बिल्कुल, एक बड़ी लाइब्रेरी होगी।

सागरिका- और लॉन में सुबह की सैर?

प्रणब- हां।

सागरिका- कोई कोट जो आप देना चाहें?

प्रणब- अभी नहीं, फिर कभी।


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