नई दिल्ली। मॉनसून सत्र करीब आते ही खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का मुद्दा एक बार फिर गरमाने लगा है। ममता बनर्जी के बाद लेफ्ट, मुलायम और जनता दल सेक्यूलर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर अपना विरोध जता चुके हैं। जनता दल युनाइटेड ने भी इसका विरोध किया है। यानि सरकार विदेशी निवेश के मुद्दे पर जल्दी फैसला करके निवेशकों को सकारात्मक संदेश देना चाहती है, लेकिन सहयोगियों और विपक्ष के रुख से साफ है कि संसद का मॉनसून सत्र हंगामेदार होने वाला है।
यूपीए सरकार दबाव में है। निवेशकों में भरोसा पैदा करना उसकी पहली प्राथमिकता है। यही वजह है कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश पर सरकार जल्द फैसला लेना चाहती है। लेकिन विरोधियों के साथ-साथ वो सहयोगी पार्टियों को मनाने में भी नाकाम रही है। सरकार को भरोसा था कि वो इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी को मना लेगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ से ये संकेत भी मिले थे। लेकिन मुलायम ने फैसला ले लिया है। लेफ्ट और देवगौड़ा की जनता दल सेक्यूलर के साथ मिलकर मुलायम ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का विरोध किया है। मुलायम ने कहा है कि वो संसद में इस फैसले के खिलाफ खड़े होंगे। राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस का साथ देने वाली जेडीयू ने भी अब ये साफ कर दिया है कि विदेशी निवेश के मामले में वो सरकार के खिलाफ खड़ी है।
कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां तृणमूल और डीएमके भी इस मुद्दे पर अपना विरोध जता चुकी हैं। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा को सभी राज्यों से बात करने को कहा है। सूत्रों की मानें तो सरकार अब जल्द से जल्द अपने स्तर पर फैसला ले लेना चाहती है। आखिरी फैसला राज्यों पर छोड़ दिया जाएगा। अगर कोई राज्य खुदरा बाजार में निवेश नहीं चाहता तो वो विदेशी कंपनियों को लाइसेंस देने से मना कर सकता है। वाणिज्य मंत्री ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री को इस बारे में चिट्ठी भी लिखी है।

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक ये मामला इतना संवेदनशील हो चुका है कि पार्टी के भीतर भी इसको लेकर एकराय नहीं है। सरकार के सामने दिक्कत ये है कि आर्थिक मोर्चे को दुरुस्त करना राजनीतिक लिहाज से घाटे का सौदा हो सकता है। जिस तरह तमाम पार्टियां मोर्चेबंदी कर रही हैं, वो 2014 के आमचुनाव में असर दिखा सकता है।
दरअसल खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को लेकर कैबिनेट फैसला ले चुकी है। पिछली बार विरोध देखते हुए फैसले को सिर्फ टाल दिया गया था। इसलिए इसे लागू करने के लिए दोबारा कैबिनेट की मंजूरी की जरुरत नहीं है। सरकार की रणनीति ये है कि इस फैसले को जल्दी से नोटिफाई कर दिया जाए ताकि उसके बाद अगर इस मुद्दे पर कोई बवाल होता है तो उसका ठीकरा राज्य सरकारों के सिर फूटेगा।
सरकार की असली चिंता 8 अगस्त से शुरु होने वाला संसद का मॉनसून सत्र है। विदेशी निवेश के मुद्दे पर संसद में हंगामा मचना तय है। ऐसे में सरकार की कोशिश है कि कम से कम कांग्रेस की राज्य सरकारें, सत्र शुरु होने से पहले खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का समर्थन करती दिखें, ताकि विरोध की धार कम की जा सके।
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