आपके कुछ भी सोचने मात्र से वो काम तुरंत हो जाए। क्या ऐसा हो सकता है। इसी सोच को मुमकिन करने की कोशिश जारी है। अब देखना ये है कि क्या ये वैज्ञानिक इस रिसर्च में सफल हो पाते हैं।
हो सकता है आने वाले वक्त में ये सब हो जाए क्योंकि इंसान और मशीन के बीच रिश्ता और गहरा होता जा रहा है। दूरियां कम हो गई हैं। एक दूसरे का दखल काफी बढ़ गया है।
ये आंखे इंसानों के बीच अपनी जगह तलाश रही हैं, कौन है ये इंसान या फिर मशीन या फिर दोनों का मिलाजुला रूप, ये साइबोर्ग है। साइबोर्ग, यानी मशीनी जिस्म में इंसानी दिमाग। ये रोबोट से कई गुना बेहतर होते हैं और अब वक्त आ गया है कि इनसे हाथ मिला ही लिया जाए।
अब वो दिन दूर नहीं जब साइबोर्ग हमारे बीच होंगे, अपनी डिजिटल पहचान के साथ। उनकी अपनी दुनिया होगी।
अब इनके साथ इंसानों की कैसी निभेगी ये सोचने की बात है, पट गई तो अच्छा वरना इन साईबोर्ग्स से तो भगवान बचाए।
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