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सफल राजनेता विलासराव देशमुख जो बन न सके अभिनेता!

| Aug 14, 2012 at 08:52pm | Updated Aug 14, 2012 at 11:24pm

मुंबई। 1960 के शुरुआती दशक में पुणे विश्वविद्यालय के एक युवा और आकर्षक विद्यार्थी के मन में एक महत्वाकांक्षा पनप रही थी- फिल्म स्टार बनने की। लेकिन बाद के वर्षों में विलासराव दगदोजी देशमुख नामक इस युवक का बॉलीवुड का सपना टूट गया और वह राजनीति में एक तारे के रूप में उभरा।

यह अलग बात है कि विलासराव का रंग-रूप उन दिनों के सुपर स्टार शत्रुघ्न सिन्हा से मेल खाता था और मित्रों के बीच वाहवाही बटोरने के लिए वह अक्सर सिन्हा की संवाद अदायगी की नकल भी उतारते थे। बहरहाल, देशमुख अपने गृह जनपद लातूर से राजनीति के परदे पर अपनी शुरुआत की। दो बार के स्नातक और वकील देशमुख 29 वर्ष की उम्र में ही 1974 में एक सबसे युवा सरपंच बने।

राजनीति के रास्ते में उन्हें भले ही तमाम रोड़ों का सामना करना पड़ा हो, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। कांग्रेस के वफादार सिपाही के रूप में देशमुख महाराष्ट्र के दो बार मुख्यमंत्री बने और केंद्रीय मंत्री भी।

देशमुख ने 2004 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद शरद पवार का नाम लेते हुए इस लेखक से कहा था कि मैंने ताकतवर राजनीतिक विरोधियों के बावजूद यह सबकुछ हासिल किया है।

इन वर्षों के दौरान देशमुख-पवार के बीच नफरत भरा रिश्ता शायद ही किसी से छुपा था। दोनों महत्वाकांक्षी मराठा क्रमश: महाराष्ट्र के पिछड़े मराठवाड़ा और सम्पन्न पश्चिमी महराष्ट्र से आते हैं। देशमुख ने सिर्फ 1995 का विधानसभा चुनाव छोड़कर बाकी 1980 से लगातार सभी चुनावों में विजयी रहे। उनके मंत्री बनने का सिलसिला 1982 में शुरू हुआ और वे सभी महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे।

1995 में अपनी हार के बावजूद देशमुख ने 1999 में राज्य में सर्वाधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज कराकर जोरदार वापसी की। जब शरद पवार ने कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (रांकपा) बनाई, तो अगले मुख्यमंत्री के लिए एक मजबूत नेता की तलाश में कांग्रेस परेशान थी। अंत में यह तलाश देशमुख पर जाकर समाप्त हुई। और इस तरह उन्होंने 1999 से 2003 तक राज्य में शासन किया।

कांग्रेस महासचिव के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश करने के बावजूद देशमुख की धड़कन में महाराष्ट्र ही था। देशमुख वापस मुम्बई लौटना चाहते थे।

यह मौका 2004 में उस समय मिला जब वह दोबारा मुख्यमंत्री बने। लेकिन पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा 2008 में मुम्बई पर किए गए हमले के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। संस्कृति मंत्री के रूप में देशमुख के भीतर फाइन आर्ट, संगीत, नृत्य, फिल्म और नाटक के प्रति प्रेम जगा, जो अंतिम समय तक उनके साथ जुड़ा रहा।

एक बार उनसे पूछा गया था कि उनके कार्यालय और आवास पर बॉलीवुड की हस्तियों का इतना जमावड़ा क्यों रहता है। इस पर देशमुख ने कहा था कि उनमें से अधिकांश कहीं न कहीं जमीन चाहते हैं। उनका पक्ष जायज होने पर सरकार इस पर विचार करती है। कुछ वर्षो पहले फिल्मकार सुभाष घई को भूमि आवंटन से सम्बंधित विवाद में उनका नाम आया था।

यद्यपि देशमुख कांग्रेस में किसी गुट से जुड़े हुए नहीं जाने गए, लेकिन दिवंगत माधवराव सिंधिया से उनकी अच्छी मित्रता थी। सिंधिया को वह अपने सलाहकारों में मानते थे। विमान दुर्घटना में जब सिंधिया का निधन हुआ था तो उस समय देशमुख हैदराबाद हवाई अड्डे के लाउंज में थे। निधन की खबर मिलते ही वह फफक कर रो पड़े थे।

इन वर्षों के दौरान देशमुख के साथ राजनीतिक विवाद, भूमि घोटाले और पद के दुरुपयोग के आरोप भी जुड़े रहे। 2009 में जब कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर दोबारा सत्ता में लौटी तो देशमुख मनमोहन सिंह सरकार में शामिल हुए।

देशमुख के दोस्तों के अनुसार, उनकी बीमारी और उसके कुपरिणामों के बारे में पिछले वर्ष पता चला। उन्होंने एहतियात बरतने शुरू किए, इसके तहत उन्होंने हल्की जिम्मेदारियां ली। उनके लिए संतोष की बात यह रही कि उनके पुत्र रितेश ने फिल्म स्टार बनकर और उभरती तारिका जेनेलिया डीसूजा से शादी रचाकर उनके सपने को पूरा किया।

देशमुख के मित्र कला-संस्कृति, सहकारिता आंदोलन, शिक्षा को बढ़ावा देने और खासतौर से ग्रामीण इलाकों में प्रशासन की मजबूती में दिए गए उनके योगदान की सराहना करते हैं। वह हमेशा कहा करते थे कि वह महाराष्ट्र को देश का नम्बर एक राज्य और मुम्बई को शंघाई बनाना चाहते हैं। लेकिन 67 वर्षीय देशमुख अपने इन सपनों को अधूरा छोड़ मंगलवार को चेन्नई के एक अस्पताल में हमेशा के लिए दुनिया को सपना हो गए।

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