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पीएम के इस्तीफे पर अकेली पड़ती दिख रही है बीजेपी

| Aug 22, 2012 at 05:58pm | Updated Aug 22, 2012 at 11:48pm

नई दिल्ली।कोयला आवंटन मामले में पीएम के इस्तीफे पर अड़ी बीजेपी अब अकेली पड़ती दिख रही है। लेफ्ट तो संसद में चर्चा की मांग कर ही रहा था अब एनडीए के ही सहयोगी जेडीयू ने भी पीएम की इस्तीफे की बजाय संसद में चर्चा को ही बेहतर विकल्प मानने के संकेत दिए हैं।

कोयला खदान आवंटन मसले में पीएम के इस्तीफे की मांग को लेकर बीजेपी ने आज भी संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी। सरकार कोयला खदान आवंटन पर चर्चा के लिए राजी है लेकिन बीजेपी की जिद है कि चर्चा पीएम के इस्तीफे के बाद ही होगी। बुधवार सुबह हुई बीजेपी संसदीय दल की बैठक में इस रणनीति पर मुहर लगाई गई। बैठक में मौजूद वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने यूपीए सरकार को देश पर बोझ करार दिया।

लेकिन बीजेपी का कट्टर रुख उसके सहयोगियों को ही रास नहीं आ रहा है। एनडीए के संयोजक शरद यादव निजी तौर पर चर्चा के पक्ष में हैं, तो प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने कहा है कि बड़े दल सिर्फ 2014 के चुनाव को देख रहे हैं।

शरद यादव ने कहा कि इस मुद्दे पर सदन में चर्चा ही बेहतर विकल्प है लेकिन ये मेरी व्यक्तिगत राय है और चूंकि हम एनडीए के अनुशासन से बंधे हुए हैं इसलिए एनडीए की जो राय है वही हमारी पार्टी की राय है। जेडीयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने कहा कि बड़ी पार्टियां इस मुद्दे को 2014 के लोकसभा चुनाव में मौके के तौर पर देख रही हैं।

वाम खेमे के नेता गुरुदास दासगुप्ता ने भी कहा कि ज्यादा समय तक संसद के काम को बंद करना हमारे हिसाब से सही नहीं है। इस पर बातचीत करनी चाहिए। कांग्रेस का आरोप है कि राजनीतिक कारणों से बीजेपी चर्चा से भाग रही है। दरअसल, 2005 में छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने केंद्रीय कोयला सचिव को पत्र लिख कर राज्य के हित और कोयला के दाम बढ़ने की आशंका जता कर नीलामी की जगह आवंटन को बेहतर बताया था। वहीं 2005 में ही राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने भी पीएम को खत लिख कर नीलामी प्रक्रिया का विरोध किया था।

यानी बीजेपी को डर है कि चर्चा होगी तो कांग्रेस गड़े मुर्दे उखाड़ कर बीजेपी के विरोध की धार को कमजोर कर देगी। हालांकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह कह रहे हैं कि उन्होंने राज्य की स्थिति देखते हुए ये राय दी थी। जाहिर है, बीजेपी की इस कमजोर नस को दबाने में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही है।

इसमें शक नहीं कि अब तक प्रधानमंत्री को बख्शती आ रही बीजेपी ने अब सीधे उन्हें निशाना बनाकर बड़ा दांव खेला है। वो भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल को अपने पक्ष मे मोड़ना चाहती है। लेकिन क्या ये सब सचमुच इतना आसान होगा। खासकर जब विरोध में मुट्ठी तानते ही बीजेपी की कांख में दबे भ्रष्टाचार के वे कारनामे सबको नजर आने लगते हैं जिनका रिश्ता बीजेपी नेताओं से है।

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