आप यहाँ हैं » होम » पॉलिटिक्स

झारखंड के तीन-तीन सीएम फंसे हैं कोयले की लूट में!

| | Sep 08, 2012 at 07:45pm

नई दिल्ली। झारखंड में कोल ब्लॉक आवंटन की जांच के रडार पर तीन बड़े चेहरे हैं। पहला राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी और तीसरे पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा। राज्य में कोल ब्लॉक आवंटन में जिस तरह नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं, उसकी जांच रिपोर्ट आयकर विभाग ने तैयार कर ली है। सूत्रों की मानें तो आयकर विभाग की रिपोर्ट में अर्जुन मुंडा, बाबू लाल मरांडी और मधु कोड़ा के फैसलों के बारे में काफी बातें कही गई हैं।

गौरतलब है कि सीएजी ने जिन 57 कोल ब्लॉकों पर उंगली उठाई है उनमें से 27 झारखंड में ही हैं। आरोप ये भी है कि ज्योति बसु के बेटे से लेकर सुबोध कांत सहाय के भाई की कंपनी तक को आवंटन किया गया है। अपने कार्यकाल में झारखंड के तीन मुख्यमंत्रियों ने 5 दर्जन से ज्यादा कोल ब्लॉक आवंटित करने की सिफारिश की। इसी सिफारिश के आधार पर झारखंड में कोल ब्लॉक दिए गए जिनमें से 43 निजी कंपनियों को मिले। जिन कंपनियों को कोल ब्लॉक मिले उनमें से ज्यादातर कंपनियां बाहर की तो थी हीं इनको कोयले की जरूरत भी बाहर स्थित अपने प्रोजेक्ट के लिए थी जबकि नियम इसके विपरीत था।

दरअसल झारखंड में जिन कंपनियों के प्रोजेक्ट पहले से थे उनके लिए कोल इंडिया पहले ही कोयला दे रही थी। इसे टेक्नीकल भाषा में लिंकेज कहते हैं। तय ये हुआ था कि लिंकेज के बावजूद कोल ब्लॉक पाने वाली कंपनियों को उसी राज्य में स्टील, पावर या सीमेंट का प्लांट लगाना होगा। मकसद ये कि राज्य का भी विकास हो सके लेकिन झारखंड में कोल ब्लॉक आवंटन करते वक्त इस नियम की परवाह नहीं की गई।

झारखंड में 1993 से 2003 तक केवल 6 कोल ब्लॉक थे लेकिन 2004 से हर माह एक कंपनी को कोल ब्लॉक आवंटन होने लगा। देखते ही देखते झारखंड में कोयले के कारोबार पर कब्जे का खेल गैंगस्टरों के हाथ से निकलकर राजनीतिज्ञों के संरक्षण या स्वामित्व में चल रही कंपनियों के हाथ में पहुंच गया।

2004-05 में एक दर्जन कोल ब्लॉक आवंटित किए गए इसके बाद तो ये होड़ शुरू हो गई। झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, बाबू लाल मरांडी और मधु कोड़ा ने कुल 63 सिफारिशें कीं जिनमें से 43 निजी कंपनियों के लिए थीं। अर्जुन मुंडा ने 23, बाबू लाल मरांडी ने 14 और मधु कोड़ा ने 13 कोल ब्लॉकों की सिफारिशें कीं। खास बात ये कि इन कंपनियों को कोल ब्लॉक देते हुए इनके बैकग्राउंड की जांच तक करने की जरूरत महसूस नहीं की गई। कोल ब्लॉकों की अंधाधुंध सिफारिश करने वाले मुख्यमंत्रियों में से एक मधु कोड़ा की जांच के बाद आयकर विभाग ने उन पर 3300 करोड़ रुपये की देनदारी निकाली है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये पैसे किस तरह कमाए गए होंगे।

वैसे बात सिर्फ इन मुख्यमंत्रियों पर खत्म नहीं होती। 11 अगस्त 2010 को कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने एक कंपनी के लिए चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में उस कंपनी का बचाव किया गया था जिसके खिलाफ ये शिकायत की गई थी कि वो झारखंड से कोयला बाहर ले जा रही है। नियमों के तहत कोई भी कंपनी कोल ब्लॉक आवंटन के बाद कोयला राज्य से बाहर नहीं ले जा सकती थी लेकिन तमाम कंपनियों ने इसकी धज्जियां उड़ाईं और जायसवाल पर ऐसी ही एक कंपनी के बचाव का आरोप है। दरअसल बीजेपी के एक सांसद ने शिकायत की कि झारखंड में तीन कोल ब्लॉक आवंटित कराने वाली कंपनी चोरी से कोयला हल्दिया लेकर जाती है। अपनी शिकायत के लिए सबूत के तौर पर इस सांसद ने चालान भी पेश किए।

आईबीएन7 के पास श्रीप्रकाश जायसवाल की चिट्ठी के साथ ही वो शिकायत भी है जिसके जवाब में उन्होंने ये चिट्ठी लिखी थी। इसमें जायसवाल की तरफ से दलील दी गई है कि कंपनी को पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के प्रोजेक्ट के लिए कोल ब्लॉक दिए गए थे। ऐसे में सवाल ये कि क्या किसी खास कंपनी के लिए नियमों में बदलाव किया गया क्योंकि नियमों के मुताबिक मौजूदा प्लांट के लिए तो कोल इंडिया से पहले ही कोयला मिल रहा था।

कंपनियों को नए ब्लॉक मिले ही इसी शर्त पर थे कि उसे जिस राज्य में कोल ब्लॉक आवंटन होगा उस राज्य में प्रोजेक्ट भी लगाएगी। लेकिन जिस कंपनी की शिकायत की गई उसने ऐसा नहीं किया। इस कंपनी को जुलाई 2005 और जनवरी 2006 में कोल ब्लॉक मिले थे और जब जायसवाल ने चिट्ठी लिखी तब तक आवंटन को 5 साल बीच चुके थे। इसी चिट्ठी में जायसवाल ने ये भी लिखा कि कंपनी ने झारखंड सरकार से समझौता किया है और बोकारो में स्टील प्लांट का काम भी चल रहा है। यानि दस्तावेजों से साफ है कि कंपनी ने 5 साल झारखंड से कोयला तो निकाला लेकिन बदले में राज्य को कुछ दिया नहीं।

इस कंपनी ने हर साल कोयला निकालने की क्षमता भी सरकार से बढ़वा ली मगर झारखंड में प्लांट तो दूर कंपनी द्वारा किए जाने वाले सोशल एक्टिविटी का केंद्र भी वेस्ट बंगाल ही रखा। चिट्ठी के फेर में फंसे कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल अब पूरे मामले से पल्ला झाड़ रहे हैं। जायसवाल का कहना है कि उन्हें ये मामला ही याद नहीं है।

झारखंड में कोल ब्लॉक लेने वाली ये अकेली कंपनी नहीं है जिसने नियमों की परवाह नहीं की। सुबोध कांत सहाय के साथ रिश्तों को लेकर विवादों में आई कंपनी एसकेएस इस्पात एंड पावर, जिंदल स्टील एंड पावर और आधुनिक कॉरपोरेशन लिमिटेड पर भी यही आरोप है। यही वजह है कि कुछ दिन पहले झारखंड सरकार ने इन कंपनियों के साथ समझौता रद्द किया है।

दूसरे अपडेट पाने के लिए IBNKhabar.com के Facebook पेज से जुड़ें। आप हमारे Twitter पेज को भी फॉलो कर सकते हैं।

IBNkhabar के मोबाइल वर्जन के लिए लॉगआन करें m.ibnkhabar.com पर!

अब IBN7 देखिए अपने आईपैड पर भी। इसके लिए IBNLive का आईपैड एप्स डाउनलोड कीजिए। बिल्कुल मुफ्त!

इसे न भूलें