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पुराण कथाः महर्षि भारद्वाज के पुत्र यवक्रीत का वध

Posted on Sep 13, 2012 at 01:08pm IST

नई दिल्ली। दक्षिण के एक कवि ने अपने गीत में बताया है- सभ्यता की अनेक सीढ़ियों को पार करने के बावजूद मनुष्य की उद्दाम कामनाओं में परिवर्तन नहीं आया है। उसने वेष बदला, भाषाएं सीखीं, ज्ञान का खजाना खोला, पर उसकी आकांक्षा बनी रही। दरअसल मनुष्य सदा से सुविधा भोगी बनना चाहता रहा है। श्रम, साधना और पुरुषार्थ से वह घबराने लगता है। प्रस्तुत है एक ऐसी ही पुराण कथा, जिसमें मानव की चित्तवृत्ति की सही झांकी दर्शाई गई है :

गंगा नदी के तट पर रैभ्य नामक एक महामुनि निवास करते थे। उनके आश्रम के नजदीक ही महर्षि भारद्वाज का आश्रम था। दोनों में घनिष्ठ दोस्ती थी। परस्पर एक-दूसरे के सुख-दुख का विचार रखते थें। रैभ्य मुनि के दो पुत्र थे-अर्वावसु और परावसु। दोनों भाई बुद्धिमान और समस्त विद्याओं में पारंगत थें।

महर्षि भारद्वाज के बहुत दिनों तक कोई संतान न थी। आखिर उनके एक पुत्र हुआ। भारद्वाज दम्पति ने उस बालक का नाम यवक्रीत रखा और लाड़-प्यार से उसका पालन-पोषण किया। वे अपने पुत्र को एक योग्य विद्वान बनाना चाहते थे, परंतु उस बालक की किसी भी विद्या में रुचि न थी। वह खेल-कूद में अपना समय व्यर्थ गंवाने लगा। उम्र के बढ़ने के साथ-साथ उसका आलस्य भी बढ़ता गया। बालक उद्दंड निकला। महर्षि अपने पुत्र के व्यवहार से अत्यंत दुखी रहते थे।

यवक्रीत रैभ्य पुत्रों की विद्वता और यश-प्रतिष्ठा देखकर ईष्या करने लगा। उसने सोचा, अर्वावसु और परावसु विद्या के कारण ही सर्वत्र पूजे जाते हैं। उसे भी ऐसी विद्या प्राप्त करनी चाहिए। यवक्रीत ने संकल्प तो किया, किंतु परिश्रम और निष्ठापूर्वक अध्ययन करना उसके स्वभाव के विपरीत था। तिस पर उसकी आयु भी विद्याध्ययन के अनुकूल न थी। बहुत सोच-विचार करने के सरल उपाय अथवा मार्ग तपस्या है। कठोर तपस्या करके विद्या अर्जित करनी है। यह निर्णय करके यवक्रीत ने इंद्र के प्रति घोर तपस्या शुरू की।

इंद्र ने उसकी तपस्या पर प्रसन्न होकर पूछा कि वत्स, बताओ, तुम कैसा वर चाहते हो? यवक्रीत ने अपने संकल्प की सिद्धि का अवसर पाकर गदगद् हो अपनी आकांक्षा व्यक्त की- देवेंद्र, मैं इस अवस्था में अध्ययन करके शास्त्रों में पारंगत नहीं हो सकता। इसलिए आप मुझे ऐसा वर प्रदान कीजिए, जिससे मैं बिना अध्ययन के ही समस्त वेद-पुराण और शास्त्रों का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकूं।

सुरपति इंद्र ने समझाया कि वत्स, वेद-शास्त्रों का ज्ञान आचार्यो के सान्निध्य में रहकर अर्जित किया जाता है। विद्या के बिना संकल्प की सिद्धि नहीं होती। इसलिए तुम तपस्या त्यागकर विद्याध्ययन आरंभ करो। परंतु यवक्रीत हठी था। उसने इंद्र के हित-वचनों पर ध्यान न दिया। उसके हठ को देख विवश हो इंद्र 'तथास्तु' कहकर अदृश्य हो गए।

यवक्रीत के उत्साह का पारावार न रहा। उसने अपने पिता के पास पहुंचकर अपनी सिद्धि का समाचार सुनाया। महर्षि भारद्वाज ने यवक्रीत को अपने पास बैठाकर वात्सल्यपूर्वक उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा कि कुमार, अनायास प्राप्त विद्या सच्ची विद्या नहीं होती। ऐसी विद्या अहंकार को जन्म देती है। मनुष्य में मोह, मद और मात्सर्य भाव जगा देती है। विद्या के साथ विनय शोभा देती है। हां, एक और बात ध्यान में रखो। तुम भूल से भी अपनी विद्या का प्रदर्शन रैभ्य महामुनि के सामने न करना और उनके परिवार के सदस्यों के साथ अभद्रता का व्यवहार कभी न करना। इतना ही नहीं, तुम उनके आश्रम की ओर भी मत जाना। इस प्रकार भारद्वाज महर्षि ने अपने पुत्र को सावधान रहने की चेतावनी दी।

परंतु यवक्रीत ने अपने पिता की बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। उसे अनायास प्राप्त हुई विद्या पर अभिमान था। वह मौका मिलते ही पंडितों और शिक्षाविदों को अपमानित करने से नहीं चूकता था। विद्वत समाज उसके इस व्यवहार से बहुत ही नाराज था।

एक दिन की घटना है। परावसु की पत्नी सुप्रभा पास ही स्थित नदी में स्नान करने के लिए जा रही थी। यवक्रीत की कुदृष्टि उस पर पड़ी। वह एक अपूर्व सुंदरी थी। उसके अद्भुत सौंदर्य को देख यवक्रीत चकित रह गया। मोहावेश में आकर लंबे डग भरते उसके पास पहुंचा। वह अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख सका। बिना सोचे-विचारे उसका हाथ पकड़ने को आगे बढ़ा।

उसके इस हरकत से महर्षि रैभ्य की पुत्रवधू सुप्रभा शेर को देख घबड़ाने वाली हिरणी की भांति भयभीत हो उठी। उसके पंजे से बचने के लिए तेज कदमों से आगे बढ़ी। यवक्रीत ने दौड़कर उसका रास्ता रोकते हुए याचना की कि वह उसकी कामना की पूर्ति करे। सुप्रभा ने यवक्रीत के चरित्र के बारे में सुन रखा था। उस दुष्ट से वाद-विवाद करना खतरे को मोल लेना था। लोक-लज्जा के भय से वह पल-भर भी वहां रुके बिना अपने आश्रम की ओर भाग गई।

आश्रम पहुंचकर सुप्रभा ने देखा आश्रम के भीतर कोई न था। उसका दुख उमड़ पड़ा। वह भय और लज्जा के मारे रो पड़ी और रोती ही रह गई। थोड़ी देर बाद महर्षि रैभ्य आश्रम में पहुंचे। रोती हुई पुत्रवधू को देख सांत्वनापूर्ण शब्दों में पूछा, बेटी, बताओ क्या हुआ? तुम्हारे दिल को किसने दुखाया? कहो, मैं उस दुष्ट को उचित दंड दूंगा। श्वसुर की सांत्वना पाकर सुप्रभा ने सविस्तार बताया कि किस प्रकार मुनि भारद्वाज के पुत्र यवक्रीत ने उसका अपमान किया है।

महर्षि क्रोध में आ गए। उन्होंने तत्काल अपनी जटा से एक रोम खींचकर होमकुंड में डाल दिया। उसी क्षण होमकुंड की अग्नि में से एक स्त्री उदित हुई। पुन: एक जटा निकालकर रैभ्य मुनि ने होमाग्नि में डाल दिया। इस बार एक भयंकर काया वाला राक्षस अग्निकुंड से निकल आया। होमकुंड से उत्पन्न स्त्री-पुरुष दोनों ने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि महर्षि आदेश दीजिए, हमें क्या करना है? तुम दोनों इसी समय जाकर यवक्रीत का वध कर डालो। रैभ्य मुनि ने आदेश दिया।

महामुनि रैभ्य का आदेश पाकर उसी क्षण दोनों यवक्रीत का वध करने के लिए निकल पड़े। यवक्रीत उनका आशय जानकर भयभीत हो भागने लगा। परंतु शूलधारी राक्षस उसका पीछा करने लगा। अब कोई उपाय न पाकर यवक्रीत आत्म-रक्षा के लिए नजदीक के सरोवर में जा छिपा। किंतु आश्चर्य की बात थी, अगले ही क्षण सरोवर सूख गया। यवक्रीत सोचने लगा, शील के बिना विद्या शोभा नहीं देती। परंतु अब कोई उपाय न पाकर यवक्रीत ने अपने पिता से क्षमायाचना करने के लिए उनके आश्रम में प्रवेश करना चाहा, परंतु अग्निहोम के रक्षकों ने उसको अंदर करने से रोक दिया। इतने में पीछे से राक्षस ने प्रवेश कर यवक्रीत पर शूल से प्रहार किया। उस आघात से यवक्रीत के प्राण अनंत वायु में विलीन हो गए।

(सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'पौराणिक कथाएं' से साभार)


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